वर्षा ऋतु में पाचन तंत्र कमजोर व वात का प्रकोप होता है। In the rainy season, the digestive system is weak and there is an outbreak of Vata.

वर्षा ऋतु में पाचन तंत्र कमजोर व वात का प्रकोप होता है।


गैस का प्रकोप बढ़ने व पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है इसके बुरे प्रभावों से बचने के लिए हल्का, ताजा व आसानी से पचने वाला भोजन किया जाना चाहिए।


दूध व पत्ते वाली सब्जियों का सेवन इस मौसम में नहीं के बराबर किया जाना चाहिए। बारीश के शुरूआती मौसम में पैदा हुई घास नई और कच्ची होती है जिसे गाय, भैंसे व बकरियां खाती है जिसका असर इनके दूध पर भी पड़ता है। यह दूध गुणकारी व सरलता से पचने वाला नहीं होता है।


छिलके वाली दाल में हींग व जीरा का छौंक लगा कर रोज सेवन किया जाना चाहिए।
मीठे, अम्लीय व खनिज लवण युक्त खाद्य पदार्थों का समुचित प्रयोग किया जाना चाहिए।


वर्षा ऋतु में पाचन तंत्र कमजोर व वात का प्रकोप होता है। आम, लौकी, गिलगिल तुरई, दाना मैथी, ताजा दही की लस्सी, छाछ, जामुन, मक्का के भुट्टे आदि खाने चाहिए। आम का रस पीने के बजाए आम को चूस कर खाना बहुत अच्छा रहता है। आम को चूसने से मुंह की लार भी इसमें मिल जाती है जोकि भोजन और आम को सरलता से पचाने में सहायक होता है। आम पाचन ष्शक्ति के अनुकूल ही खाना या चूसना चाहिए। आम की अधिक मात्रा खाने से यह भारी व वातकारक हो जाता है। आम खट्टा नहीं होना चाहिए यह स्वास्थ्य के लिए गुणकारी नहीं होता है।


शरीर को सुडौल, पुष्ट व शक्तिशाली बनाने के लिए 40 दिन तक सुबह भोजन के साथ रसीला आम खाना और ऊपर से सामान्य ताप का आधा ग्लास दूध पीना बहुत हितकारी है।

पुरूषों के लिए आम का सेवन धातु पुष्टता, वीर्यवर्धक, बलदायक एवं यौनशक्ति बढ़ाने में सहायक है।

स्त्रियों के लिए आम का सेवन कांतिवर्धक, सौन्दर्यवर्धक तथा बलदायक है।

वर्षा ऋतु में बादलों के आगमन से वातावरण में हवा की गति और स्थिति में परिवर्तन हो जाता है। हवा शीतल तथा नमी युक्त हो जाती है। पृथ्वी से उठने वाली गर्म भाप तथा अम्ल युक्त पानी आदि के परिणामस्वरूप जठराग्नि का कमजोर होना, गठिया, दमा व वात प्रकोप का प्रभाव बढ़ जाता है।

गर्मियों के एकत्र हुआ सूखी गंदगी व कचरा तालाबों, नदियों व पोखरों में पड़ा रहता है इन्हें समय रहते बारीश से पहले साफ करवा लेना चाहिए अन्यथा बारीश से नदी, तालाब व पोखर सब भर जाते हैं। ऐसा पानी पीना खतरनाक हो सकता है क्योंकि पानी के संपर्क में आते ही कचरा, गंदगी व अन्य दूषित पदार्थ सड़ने लगते हैं।

वर्षा ऋतु में पाचन तंत्र कमजोर व वात का प्रकोप होता है। बारीश के मौसम में कफ ष्शांत रहता है। पित्त संचित रहता है और पित्त का प्रकोप रहता है इसलिए संभल कर आहार-विहार किया जाना चाहिए। गर्म प्रकृति का आहार,रूखा, कड़वा, कसैला, बासी, भारी व देर से पचने वाला, बेसन, मैदा, तैलीय, चिकनाई व मसालेदार आहार आदि का सेवन नहीं करना चाहिए।

कार्य, भोजन, नींद, श्रम आदि संतुलित रखना चाहिए।

बरसात के मौसम में पित्त प्रकोप (एसिडीटी) और हायपर एसिडिटी हो जाती है। इससे बचने के लिए वर्षा के प्रारम्भिक मौसम में हरड़े व सेंधा नमक और ष्शरद मौसम में चीनी के साथ लिया जाना हितकर है।

मच्छर व कीड़ों से बचने के लिए मच्छरदानी या ऑडोमास आदि लगा कर सोएं।


आल आउट की खाली शीशी में नीम तेल को भर कर आल आउट की जगह काम में लें।


देर तक जागना व दिन में सोना हानिकारक है।

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