आपको ही क्यों कोई कहता है-
आपको ही को क्यों कोई कहता है जी हाँ बात मुद्धे की है। आप ही को कोई काम क्यों बताता है? आप ही को कोई क्यों डांटता है, आप ही को कोई क्यों प्रताड़ित करता है? आप ही को कोई क्यों तानाकशी करता है? सभी की नजरों में आप पर ही क्यों बंदूक तनी रहती है? सब की परेशानी या किसी और की गलती में आँखें आप पर ही क्यों गढ़ती है? जबकि कार्य व क्षमता की दृष्टि से तुलनात्मक रूप से बेहतर होते हुए भी आप ही पर क्यों कटाक्ष किया जाता है। बात छोटी सी है किंतु बहुत बड़ी है। आपको सुनने की आदत या लत पड़ गई है।

गलती भी उसी से होती है जो काम करता है ऐसे लोग जो काम नहीं करते या हमेशा काम से जी चुरा कर दूसरों पर काम लाद देते है, उनसे गलती कहां होगी। सभी चीजें आसान है। आसानी से विचारों और शब्दों को तोलकर अपना पक्ष रखने का अभ्यास करें। प्रारम्भ में कठिनाई हो सकती है किन्तु यह सत्य है बिना गलती के या बिला वजह आपको जो लोग निशाना बनाने का प्रयास करते रहे हैं धीरे-धीरे सब उलट होता जाएगा।

कार्यालय में मर्यादा, इज्जत व मान सब जरूरी है किंतु ध्यान रखें जब सामने वाले का मान है तो आपका भी तो मान है उसे धूमिल होने से बचाएं। सही व गलत पर बोलना और जवाब देना सीखिए। अपना सकारात्मक और नकारात्मक पक्ष रखना सीखें। ऐसा नहीं है कि आप किसी का अपमान करें या अपशब्द कहें किंतु कार्यप्रणाली व शब्द प्रणाली में सामंजस्यता लाना बहुत जरूरी है।

एक ओर कुछ लोग औसतन भी काम नहीं करते और किसी को शिकायत भी उनसे कभी कुछ नहीं होती है कभी सोचा है क्यों? कभी आपने उनके व्यवहारात्मक पहलुओं पर गौर किया है? ये लोग व्यवहार व बोलने में उत्तेजक रूप से आक्रामित रहते हैं और सुनाने में कभी पीछे नहीं रहते है हाथों-हाथ जवाब तलब आसानी से कर लेते हैं यहाँ तक की किसी को बेइज्जत करने में भी पीछे नहीं रहते है ऐसे लोगों से हर कोई अपना मान बचाना चाहता है इसलिए कुण्ठित मन से ही सही बाहरी ऊपरी तौर पर मसखरे लगाकर उनको मनाने का प्रयास करते हैं तो दूसरी ओर काम बोलता है। काम ही पूजा है। कार्य में माहिर की सब सुनते हैं।

बार-बार कोप कुपित होने से बेहतर है बार-बार गलत सुनने से बचाव करें। आप साथी व सहयोगियों के व्यवहार पर एक चलती फिरती मूक दृष्टि डाले। ईमानदार व भरपूर मेहनती आप है तो अपना पक्ष रखना भी सीखे ंऔर इसका अभ्यास करें। गलत सुनने व आपके साथ गलत होतेा कार्यों की अनदेखी नहीं करें। आप भलें ही सब समझ रहें हैं जान रहे हैं सामने वाले को भरपूर इज्जत दे रहे है और सामने वाला आपकी बात समझने की कोशिश ही नहीं कर रहा है और नकारात्मकता से भरपूर आप पर आक्षेप लगा रहा है और आपकी तरफ से प्रतिक्रिया निष्क्रिय है तो सामने वाले को बोलने, कहने व आप पर भारी होने का मौका बलवती होता है और फिर आप रोए, कोसे व भावनात्मक रूप से दुखी होए किसी को कुछ फर्क नहीं पड़ता। फर्क केवल आपको पड़ता है क्योंकि आप सही है और उलझनों में उलझा कर लोग खलनायक का रोल भी अदा करते है तो आत्मिक दंश लगता है और कभी-कभी ऐसी स्थिति तक उत्पन्न हो जाती है तब रोम-रोम रोने लगताहै। वैचारिक भिन्नता अलग-अलग व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न होती है।

यह समझ लेना चाहिए कि आपके सही होने पर भी जो लोग आक्षेप व तानों से आप पर छाए रहते है वे विचारों में आपके स्तर के नहीं है। आपको ही क्यों कोई कहता है सोचे और आप स्वयं में एक सकारात्मक सुधार करें और कहना, बोलना और पक्ष रखने के अच्छे माध्यम का चुनाव करें।
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