रोग की गठरी गठिया से बचने के सरल प्राकृतिक उपाय-
हमारे शरीर में वात, पित्त और कफ की प्रकृति वि़द्यमान है। गठिया वात रोगों की श्रेणी में आता है। शरीर में स्थित 213 हड्डियों पर लिपटी हुई माँसपेशियों को ढ़कने के लिए त्वचा का आवरण लगा हुआ है। हड्डियों के जोड़ को संधि स्थल कहा जाता है। इन संधियों को गतिशील बनाए रखने के लिए एक प्रकार का तरल पदार्थ इन संधियों के चारों ओर विद्यमान रहता है। जब संधियों में दर्द, वेदना, पीड़ा, सूजन, जकड़ाहट और जलन आदि उत्पन्न हो जाती है तो उसे गठिया रोग कहा जाता है जोकि लगभग 60 प्रकार का होता है। इस रोग को आर्थराइटिस कहा जाता है जोकि 30 वर्ष से 50 वर्ष की उम्र में कभी भी हो सकता है। गठिया रोग को मुख्यतः निम्न स्वरूप में जाना जा सकता है-

आस्टियो आर्थराईटिस-40 की उम्र को पार करने वाले अधिकतर इस रोग की चपेट में है। घुटनों, टखनों व कुल्हों पर इस रोग का प्रभाव अधिक पड़ता है। जोड़ों से खट-खट की आवाज सुनाई देती है जिसका मुख्य कारण है हड्डियों का घिस जाना। मोटापे से पीड़ित होने की अवस्था में जोड़ों पर अधिक दबाव पड़ने के कारण हड्डियां के बहुत जल्दी घिस जाने की संभावना रहती है। पैरों में ऐठन, टेढ़ापन, गला सूखना तथा कैल्शियम की कमी हो जाती है।

रूमेटॉयड आर्थराईटिस-महिलाओं को यह रोग अधिकांशतः होता है। इस रोग में संधियों के चारों ओर पानी भर जाता है और त्वचा सुर्ख लाल रहती है। हल्का सा छूने पर तेज दर्द होता है। हाथों की अंगुलियों, कलाई, घुटनों व कोहनी के जोड़ों में इस रोग का प्रभाव अधिक होता है। जलन तथा सूजन नियमित बनी रहती है। वजन धीरे-धीरे कम होने लगता है तथा सर्दियों में दर्द बढ़ जाता है।

पॉली आर्थराईटिस-शरीर के सभी जोड़ प्रभावित होते है जिसके लक्षण भी रूमेटॉयड आर्थराईटिस स्वरूप ही है।
जुवेनाइल आर्थराईटिस-यह रोग 10 से 15 वर्ष के बच्चों में मुख्यतः प्रकट होता है। चयापचयय की गड़बड़ी से जोड़ों में दर्द व वजन में कमी तथा सर्दी बढ़ने पर यह रोग बढ़ जाता है।

गठिया रोग के कारण-
- असंतुलित तथा अनुचित आहार, विहार तथा विचार अर्थात असंयमित जीवन-शैली, अधिक तले-भुने आहार, डिब्बा बंद पदार्थ, मैदा, चीनी, नमक, बाजार में उपलब्ध ठण्डे पेय पदार्थ अर्थात कोल्डड्रिंक्स् आदि तथा अधिक मात्रा में प्रोटीन युक्त दालों का सेवन।
- प्रोटीन का शरीर में ठीक से पचयापच न हो पाना जिससे यूरिक एसिड वृद्धि के फलस्वरूप इसका समस्त जोड़ों में जमाव हो जाता है।
- ई.एस.आर. की अधिकता की स्थिति होना भी इस रोग के लक्षण की उत्पत्ति है।
- वात प्रधान खाद्य पदार्थों यथा भिण्डी, अरबी, फूलगोभी, आलू, मटर, दालों का अधिकतम प्रयोग तथा इस रोग की स्थिति में भी साथ ही साथ टमाटर, मांसाहार, सेम, मटर, पालक व अन्य प्रकार की खटाई का उपयोग।
सावधानियाँ- - आहार व दिनचर्या में तुरन्त बदलाव कर लें। मोटापे तथा वजन पर नियंत्रण करके इस रोग को पनपने से रोका जा सकता है।
- भोजन से अम्लीय खाद्य पदार्थों को बिल्कुल त्याग दें। चाय, कॉफी, कोको, मांस तथा मांस का सूप इस रोग में विष स्वरूप है।
- क्षारीय भोजन पर ध्यान दें फल, फलों का रस, सलाद, हरी सब्जियाँ एवं इनका सूप, शहद तथा दूध की भोजन में अधिकता हो। क्षारीय पदार्थों में पानी प्रचुर मात्रा में पाए जाने के कारण मल निष्कासन में सहायता मिलती है।
- रोग की स्थिति में शरीर को गर्म रखने का प्रयास करें।
- स्नान में गुनगुने पानी का प्रयोग।
- पाचन तंत्र की मजबूती के उपाय।
भोजन- - दाना मेथी में कार्टिस्टरायड पाए जाने के कारण इसका भोजन में अंकुरित अवस्था में प्रयोग जोड़ो के दर्द में लाभकारी है।
- प्रातः खाली पेट रात में भीगो कर रखी हुई किशमिश व अंजीर खाने से कब्ज और सूजन दोनों में राहत मिलती है।
- सर्दियों के मौसम में भोजन में लहसुन एवं अदरक का प्रयोग करें।
- गाजर तथा चुकंदर मिला रस पीने से गठिया रोग को किया जा सकता है।
- हरी ककड़ी का रस यूरिक एसिड की वृद्धि रोकने में लाभकारी है।
चिकित्सा- - गर्म पानी में सेंधा नमक डालकर दो मिनट गर्म पानी का सेंक और फ्रीज का रखा ठण्डा पानी का एक मिनट का सेंक जोड़ों अथवा दर्द वाले स्थान पर टॉवल की सहायता से पाँच बार करें। जोड़ों की सूजन व दर्द में जल्दी राहत मिलती है।
- सर्दियों मे दर्द का जोर अथवा कड़ापन रहने की स्थिति से बचने के लिए रात को सोते समय जोड़ो पर नारियल तेल में कपूर मिलाकर लगाए तथा इस पर जरा सा सेंधा नमक डालकर प्लास्टिक थैली जोड़ों में बांधकर सो जाये राहत मिलेगी।
योगासन-
शरीर की सभी संधियों को चलाने वाले आसनों के साथ सूक्ष्म व्यायाम किए जाने चाहिए। रीढ़ के घुमावदार आसन लाभदायक है। भुजंगासन, शलभासन, चक्रासन, धनुरासन, पद्मासन तथा सूर्यभेदी प्राणायम के प्रति नियमित अभ्यास तथा रूचि सदैव रखें।
मंत्र तथा लेश्याध्यान-
ष्शांत चित्त हो अपनी आँखें कोमलता से बंद करके अपनी हथेलियों को आपसे में घर्षण देकर दर्द अथवा जोड़ वाले स्थान पर अपनी हथेलियों को रखें और दर्द अथवा जोड़ वाले स्थान पर बंद आँखों से लाल रंग देखते हुए अर्थात् अपना पूरा ध्यान वहीं केन्द्रित करते हुए (हथेलियों से सीधा स्पर्श) लाम (LAM)…लाम (LAM)…लाम(LAM)…लाम (LAM)…दस मिनट तक अभ्यास करके इस रोग से मुक्त हुआ जा सकता है बशर्ते आहार, विहार तथा व्यवहार आपके स्वयं के प्रति सकारात्मक हो।
दुष्प्रभाव- - दीर्घअवधि तक इस बीमारी के शरीर में स्थित रहने पर हृदय, धमनी, लिवर, आँतों, मूत्र संस्थान तथा पित्ताशय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
- रोग की गठरी गठिया है। गठिया रोग के बचाव हेतु स्टीरायड जैसी दवाओं के इस्तेमाल से अनेक रोगों का शरीर में और जन्म हो जाता है। दवाओं की श्रेणी के अंतिम चरण में ऐसी स्थिति भी आती है कि स्टीरायड भी दर्द कम करने में सहायक नहीं बनता। गठिया शरीर की गठरी बना देता है जो कि जीर्ण अथवा असाध्य रोग की श्रृंख्ला में आता है। उचित खान-पान, दैनिक चर्या, योग तथा प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा इस रोग पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
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