डॉक्टर की खरीददारी बन्द करिए! मन व शरीर के संकेत समझे।
जाने-अनजाने कभी न कभी शारीरिक और मानसिक व्याधियां आ घेरती है और मालूम भी नहीं पड़ता कि कब इनके चंगुल में फंस कर उलझ जाते हैं। बार-बार छोटी-छोटी बीमारियों के लिए लोग बिलावजह हर क्षण डॉक्टर के पास भागते है और घंटो बर्बाद करते है। पैसों की तो बस पूछिए मत आपकी ही सहमति से आपकी आँखों के सामने ही जेब बराबर कटती रहती है।

मनोवैज्ञानिक और चिकित्सक कहते हैं कि अधिकतर रोग और व्याधियां चिंता और इससे उत्पन्न तनाव के कारण उत्पन्न होते हैं। बीमारी नहीं है लेकिन बीमार महसूस करते है। यह सब असंतुलित दिनचर्या का परिणाम है।
चिंता और तनाव के अनेक कारण बन सकते हैं किन्तु कुछ कारणों पर शायद हमारा ध्यान ही नहीं जाता जैसेकि शोर भी तनाव व चिंता का कारण हो सकता है और शोर को रोकने का प्रयास हमारी ओर से कभी नहीं होता। 65 से 80 डेसीबल शोर कानों पर बहुत दबाव अर्थात् जोर डालता है। इससे अधिक 90 डेसीबल शोर सुनने की क्षमता को नुकसान पहुंचा सकता है।

शोर से नींद टूटती है या नींद ही नहीं आती है। बार-बार सोने के प्रयास में शोर के कारण गहरी नींद में बाधा पहुँचती है। अधिक शोर के दबाव से दिल, मस्तिष्क, पेट तथा रक्त तथा वायु प्रवाहन की क्रियाविधि में रूकावट और गड़बड़ी पैदा हो जाती है।
दिमागी काम करने वाले लोगों को शोर से बचना चाहिए और पूर्ण गहरी नींद लेनी चाहिए और दिन में विश्राम बीच-बीच में करना चाहिए।
शोर आज कदम-कदम का साथी है किन्तु शरीर इसका आदि कभी नहीं हो सकता और अति होने पर रोगग्रस्त हो जाता है। कार, स्कूटर, मोटरसाईकिल या गाड़ियों का हॉर्न, तेज आवाज में चिल्लाना या बात करना, टीवी, रेडियो या मोबाईल पर तेज आवाज में सुनना, घर व गाड़ियों के दरवाजे फटाक से तेज ध्वनि से बंद करना, बर्तन पटकना, तेज और तीखा संगीत आदि का शोर हमारे जीवन का हिस्सा बन रहा हैं और हम इसे नज़रअंदाज कर रहे हैं किन्तु यह सब कब बीमारी दे जाते हैं आहट भी नहीं होती।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखे तो अतिमहत्त्वकांक्षा, ईर्ष्या, डर, भय, क्रोध, धूम्रपान, नशा, निराशा, नकारात्मकता व क्षमता से अधिक भाग-दौड़, देर रात तक खाना और फिर सोना, अप्राकृतिक खान-पान और विहार आदि कारण भी चिंता व तनाव का कारण बनकर रोग दे जाते हैं। खुद के द्वारा पैदा की गई अशांति हमें ज्याद अशांत करती है।
नींद को रोकने या भगाने का प्रयास प्राकृतिक रूप से मन और शरीर को बीमारी से ग्रस्त करना है। बाहरी दुनिया का हम बखूबी ध्यान रखते हैं पूरी जानकारी लेते रहते हैं किंतु अधिकांशतः शरीर व मन की अपनी दुनिया की खबर हम कभी नहीं लेते। शरीर व मन दोनों ही रोगों की चेतावनी हमें समय-समय पर देते हैं किंतु असावधानी और आपाधापी में हम आसानी से इनकी अवहेलना कर देते हैं।

दैनिक चर्या ही अधिक तनाव और चिंता का कारण होती है। यदि लाइफ स्टायल सही होगी तो अनेक रोग स्वतः ही दूर होने लगते हैं।
मन और शरीर की पेचिदगियों को समझने का प्रयास करना चाहिए। शरीर की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली छोटे-छोटे संकेत देती है इनकी अवहेलना नहीं करके सजग हो जाना चाहिए। इसके कमजोर पड़ते ही भिन्न-भिन्न रोग आ घेरते हैं। शरीर और मन पर जबरदस्ती इच्छाएं मत लादिए और ना ही इनके साथ जबरदस्ती करिए।

डॉक्टर की खरीददारी बन्द कर मन व शरीर के संकेत समझे।यदि मानसिक रूप से चिंताओं को अच्छी सूझबूझ और सकारात्मक विचारधारा से दूर किया जा सकता है तो जरूर दूर कर लेना चाहिए चिंताओं और दुविधाओं को मन में पोषण नहीं देना चाहिए। व्यवहार और आदतें बदल डालिए।
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