जल शुद्धि –
जल है तो जीवन है। मानव शरीर में लगभग 70 प्रतिशत जल होता है जोकि रक्त संचार, चयापचय, मल-मूत्र निष्कासन, पाचन, अवशोषण, शरीर का तापमान नियंत्रण आदि में सहायक है। प्रोटीन, कार्बोज, वसा हरी सब्जियाँ, रस, फल व अन्य पेय पदार्थों से जल की प्राप्ति होती है। इसकी कमी से अपच, उल्टी, दस्त, मूर्छा, प्यास व अन्य रोग प्रकट हो सकते हैं।

प्रकृति के इस अमूल्य उपहार को धारण किए बिना स्वस्थ जीवन के लिए सोचा भी नहीं जा सकता है। बाजारू डिब्बा बंद पानी की प्लास्टिक बोतलों या नवीन तकनीक के साथ बने आर. ओ., वाटरप्यूरीफाई आदि मशीनरी के इस्तेमाल के बजाए पुराने परम्परागत बर्तनों का अधिकतम उपयोग अति उत्तम है।
पीने के पानी में चने के बराबर फिटकिरी पीस कर डालें जिससे थोड़ी देर में कचरा मिट्टी के नीचे बैठ जाता है। दक्षिण भारत में आज भी पानी को पीने के प्रयोग में लेने से पहले गर्म किया जाता है। ठण्डा होने पर मटके आदि परम्परागत पात्रों में रखा जाता है। पानी में तुलसी, निर्गुण्डी या नीम के कुछ पत्ते डाल कर शुद्ध किया जा सकता है।

फ्रीज, बर्फ व सोडा पानी के सेवन से सदैव बचें। परम्परागत मिट्टी के बर्तन भी पूर्णतः उपयुक्त है। प्राचीन काल से सोने, चांदी, कांसे, तांबे, पीतल व लोहा के बर्तनों में भोजन की उपयोगिता का उल्लेख मिलता रहा है। इनमें भोज्य पदार्थों को जहरीला बनाने वाले विषाणुओं को मारने की क्षमता होती है।
सोने की प्रकृति गर्म है। सोने के पात्र में रखा पानी पीने, भोजन पकाने व करने से शरीर के अंग आंतरिक तथा बाहरी रूप से मजबूत, ताकतवर व कठोर बनते है। नेत्र ज्योति भी बढ़ती है।
मल्टीपल मस्क्यूलर समस्या के लिए चाँदी के बर्तन में रखा पानी उत्तम है। जाहिर है इनकी महत्ता नैनो रूप में चाँदी और तांबे की धातुओं का प्रयोग वाटर फिल्टर तथा एयर फिल्टर टेक्नोलोजी में अपनाया जा रहा है। चाँदी की तासीर ठण्डी है। यह शरीर को ठण्डक पहँुचाती है। वात-पित्त तथा कफ दोषों का नियंत्रित करती है तथा याददाश्त व नेत्र ज्योति को तेज करने हेतु बहुत उपयोगी है।
कांसा के बर्तन याददाश्त तेज करने, भूख बढ़ाने, रक्त पित्त शांत करने तथा रक्त शुद्धि में सहायक है। खट्टे पदार्थों का इनमें प्रयोग वर्जित है क्योंकि खट्टे पदार्थ इनमें विषजन्य हो जाते है।
तांबे के बर्तन में रखे पानी से कब्ज, रक्त विकार, उष्णता, पेट के कीड़े, बवासीर, एनीमिया, कफ, यकृत, चर्मरोग तथा संधियों के दर्द आदि उपचार में सहायक है। हिमोग्लोबिन की कमी, बाल, पेट तथा मासिक धर्म संबंधी समस्याओं के लिए पीने के पानी के लिए तांबे के बर्तनों का उपयोग अच्छा रहता है। तांबे के बर्तन को लकड़ी के पट्टे पर रखा जाना चाहिए। रात्रि को चार-पाँच घंटे पानी भरकर रखने पर तांबे के गुण पानी में समाहित हो जाते है। यह शरीर से दूषित पदार्थों को शरीर से बाहर निकाल फैंकता है। दूध का प्रयोग तांबे के बर्तनों में न करें।

पीतल का उपयोग कफ, वात व कृमि रोग दूर करता है। इन सब गुणों के बावजूद हम इनके प्रयोग से बहुत दूर जा चुके है और विषजन्य महंगे उपकरणों को खरीद कर उसका पानी पीना पसंद करते है।
फ्रीज में रखने वाली प्लास्टिक की बोतलों को घर से भगा दें सपमि वितबम मदमतहल (जीवनी शक्ति) शून्य हो जाती है। प्लास्टिक में डाईऑक्सिन नामक घातक रसायन पानी में मिल जाता है जोकि कैंसर तक पैदा कर देता है। वाटर प्यूरीफायर भी प्लास्टिक के ही बने होते है।

जल शुद्धि के लिए परम्परागत तरीकों को पुनः अपनाने की आवश्यकता आ पड़ी है जिन्हें त्यागने के कारण ही शरीर में जल तथा इसके पोषक तत्त्वों के अभाव के कारण रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी के साथ ही साथ जल संबंधी बीमारियाँ भी बढ़ रही हैं। विभिन्न अध्ययनों में वैज्ञानिक तौर पर पुष्टि की जा चुकी है कि प्लास्टिक पैकिंग, बर्तन या माईक्रोवेव में खाना पकाने या गर्म करने पर भी भोज्य पदार्थ में जहरीला रसायन बन जाता है। स्टाईरिन फोम के बने ग्लास और दोनें भी घातक रसायन छोड़ते हैं। इनके साथ ही साथ एल्म्युनियम के बर्तन का उपयोग नुकसान ही नुकसान करता है। यह आयरन व कैल्शियम सोंख लेता है जिससे हड्डियां कमजोर हो जाती है, मानसिक और शारीरिक बीमारियां पनप जाती है। गुर्दे, स्नायु तंत्र, टीबी, अस्थमा, दमा, वात तथा मधुमेह के लिए घातक है। स्टील व काँच के बर्तन सामान्य है जिनसे कोई लाभ अथवा हानि नहीं होती है।
व्यवहार पर प्रभाव
पानी की थोड़ी सी कमी मिजाज, ऊर्जा, व्यवहार, विवेक क्षमता के स्तर पर तुरन्त प्रभाव डालती है। क्रोध, अवसाद या आक्रामकता की स्थिति में पानी उग्रता रोकता है। पानी द्वारा शारीरिक तथा मानसिक परिवर्तन किया जा सकता है।
अपवाद स्वरूप थोड़ा सा भी प्यासा न रहें। शरीर की आंतरिक सफाई पानी से भलीं प्रकार हो जाती है। अनुपयोगी तथा विषजन्य पदार्थों को शरीर से आसानी से पानी के द्वारा ही बाहर धकेला जा सकता है और अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त किया जा सकता है।
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