गुस्से से खुद को और बच्चों को ऐसे बचाएं-

तीन भोजन अर्थात् सुबह का नाश्ता, दोपहर व सायं भोजन समय से लेना चाहिए।
मौसमी फल, सब्जियां और एंटीऑक्सीडेंट युक्त वाले खाद्य पदार्थ अधिक से अधिक ग्रहण किए जाने चाहिए।

विटामीन बी समूह वाले खाद्य पदार्थ पर्याप्त मात्रा में खाने चाहिए।
पानी खूब पीना चाहिए। अधिक समय तक भूखा नहीं रहना चाहिए।

अपने खास दोस्तों, घर के सदस्यों व रिश्तेदारों से सप्ताह में एक बार जरूर मिलना चाहिए।
सोशल मीडिया का कम से कम प्रयोग करना चाहिए।
घर के सदस्यों के साथ कम से कम एक घंटा जरूर बिताना चाहिए।

क्रोध की समस्या बढ़ने पर नशीले पदार्थों से दूरी बनानी चाहिए। मनोचिकित्सक से परामर्श लेकर चीजे आसानी से सुधारी जा सकती है।
असुरक्षा की भावना, परिवार के सदस्यों के मध्य भावनात्मक सहयोग का अभाव, नौकरी या कार्य स्थल पर असंतोष, कार्य का बोझ, कर्ज से घिरना, मन की बात बाहर नहीं निकाल पाना और भीतर ही भीतर घुटते रहना, देर रात तक जागना और सुबह देर तक उठना, आठ घंटे से कम नींद लेना, मानसिक दबाव व तनाव में अधिक रहना, टीवी व मोबाईल पर हिंसक कार्यक्रम व वीडियों देखना आदि कारण चिड़चिड़ापन, गुस्सा व तनाव के कारण बन रहे हैं। वर्तमान में मुख्य कारण सोशल मीडिया व मोबाईल एप का बढ़ता दुरूपयोग है।
बच्चों के प्रति अधिक सजग रहें-
बच्चों की पसंद पर माता-पिता को अधिक सजग रहने की आवश्यकता है। बच्चे कार्टून फिल्म अधिक देखते है और उसमें निहित चरित्र के अनुसार खुद भी अनुसरण करने लगते हैं।
माता-पिता का झगड़ा, घर व आस-पास के माहौल का प्रभाव बच्चों पर जल्दी पड़ता है। माता-पिता का दायित्त्व है कि वे बच्चों के लिए अच्छे व सुखद माहौल की स्थिति बनाए रखें।
कुपोषण की स्थिति होने से बच्चे मानसिक व शारीरिक रूप से बीमार हो जाते है और कुपोषित बच्चों में चिड़चिड़ापन व गुस्से की मात्रा बढ़ने लगती है।
अपने बच्चों को टीवी, मोबाईल या सिनेमाघर में हिंसक, घातक व आक्रामक सीरियल, एपिसोड व फिल्में दिखाने से बचना चाहिए।
कम उम्र में ही बच्चों को मोबाइल खेलने के लिए नहीं देना चाहिए।

गुस्से से खुद को और बच्चों को बचाने के लिए, बच्चों के साथ कम से कम एक घंटा जरूर खेलना चाहिए।
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