हार्मोन्स जो गुस्से के लिए जिम्मेदार होते है-
व्यक्ति का स्वभाव और विचार भी हार्मोन्स की स्थिति तय करते हैं।
कार्टिसोल, सेरोटोनिन हार्मोन्स का स्राव बढ़ जाने के कारण तुरंत हाइपर हो जाना, छोटी-छोटी बात पर गुस्सा आना, अवसाद व तेज आवाज में चिल्लाने की स्थिति होने लगती है।

इन्सुलिन हार्मोन की कमी से खून में ग्लूकोज का स्तर असंतुलित हो जाता है और थकान, नींद नहीं आने की शिकायत, कमजोरी और चिड़चिड़ापन बढ़ने लगता है।

थाईराइड ग्रन्थि से होने वाला स्राव असंतुलित हो जाने के कारण कमजोरी का अनुभव व मूड बदलने लगता है।
गुस्सा के दौरान कैटाबॉलिक हार्मोन्स सक्रिय हो जाने के कारण व्यक्ति को अधिक ऊर्जा की आवश्यकता हो जाती है। ग्लूकोकॉर्टिकॉइड हार्मोन ज्यादा बढ़ जाते हैं। इनके बढ़ने से दिमाग का वह हिस्सा जो निर्णय लेता है वह विवेकपूर्ण फैसले लेने की क्षमता खो देते हैं और कुछ भी अच्छा नहीं लगने जैसी स्थितियां उत्पन्न होने लगती है।

गुस्से के दौरान एड्रिनलिन, नोराड्रिनलिन व अन्य हार्मोन्स का स्तर बढ़ जाता है ऐसी स्थिति मंे शरीर अधिक ताकतवर हो जाता है।
जो लोग छोटी-छोटी बात पर क्रोधित हो जाते है उन्हें हार्ट अटैक, किडनी फेलियर, हृदय रोग और पाचन तंत्र संबंधी रोग होने की संभावनाएं बढ़ जाती है। बार-बार गुस्सा करने के परिणामस्वरूप हृदय की पंपिंग क्षमता घटने लगती है और हृदय की मांसपेशियां कमजोर होने लगती है।
हार्मोन्स जो गुस्से के लिए जिम्मेदार होते है और बार-बार गुस्सा करने से तेज सिर दर्द, माईग्रेन, उच्च रक्तचाप, टेस्टेस्टॉरान हार्मोन का असंतुलन, बांझपन, चेहरा लाल होना, संवेदनशीलता, रेशेज, मुंहासे व अन्य त्वचा संबंधी बीमारियां होने लगती है।

छोटी छोटी उलझनों में झिड़झिड़ाना, कॉल नहीं लगने पर मोबाईल या अन्य कोई वस्तु उठा कर पटक देना, सड़क पर वाहन को साइड नहीं मिलने के कारण बड़बड़ाना, अपशब्द बुदबुदाना, बार-बार हॉर्न बजाना, सड़क पर ही बहस करना, चीखना-चिल्लाना या हाथापाई पर उतर आना आदि गुस्सा बढ़ने के संकेत है जोकि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है।
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