बुजुर्गों की देखभाल की जिम्मेदारी कौन लेगा-जन्म, शिशु, बालक, किशोर, युवा, प्रौढ़ व वृद्धावस्था और फिर अन्तः मृत्यु यही जीवन का सत्य है।
वर्षों से चली आ रही परम्परा एकल परिवार व भाग-दौड़ की जिन्दगी का परिणाम परिवार बिखर रहे हैं। जाने-अनजाने युवा अपने माता-पिता की देखभाल की अनदेखी कर जाते हैं और यही युवा जब वृद्धावस्था तक पहुँच जाते है तब यहाँ भी देखभाल की अनदेखी की पृनरावृत्ति प्रारम्भ हो जाती है।

जैसा बोएंगे वैसा काटेंगे यहाँ मुहावरा देना उचित नहीं किंतु इसमें भी कुछ सत्यता का अंश जरूर छिपा है। युवा पीढ़ी बुजुर्गों का ख्याल नहीं रखती यह दोष युवा पीढ़ी पर सीधे नहीं थोपना चाहिए।

युवावस्था के जोश-होश में युवक व युवतियां अथवा महिलाएं व पुरूष हमें अपनी स्वयं की जिन्दगी जीनी है के उद्वेश्य में बुजुर्गों को अनचाहे ही नज़रअंदाज कर देते हैं। मैं और सत्ता के भ्रम में अपनों की आत्मियता, समर्पण, प्रेम व त्याग को भी रौंद देते हैं।
समाज में देखा गया है कि युवावस्था पश्चात् प्रौढ़ावस्था तक पहुंचते-पहुंचते बेटे-बहुओं के प्रति सम्मान, आदर, विश्वास, प्रेम व समर्पण का भाव धीरे-धीरे व्यवहारिक रूप से कम होने लग जाता है। कुछ अहंकार और कुछ स्वार्थ सा यदि रिश्तों में झलक जाए तो रिश्तों को बिखरने में वक्त भी नहीं लगता। बेटा अपना और बेटी पराई यही परम्परा हमारे समाज ने हमें परोसी है किंतु भारतीय संस्कार और परम्परा अभी भी बचे हैं इन्हें खो देने का हर्गिज प्रयास नहीं करना चाहिए। शिक्षा और ज्ञान ने जागरूक और सतर्क बना दिया है। कानून, अधिकार, कर्तव्य, सही और गलत का पहलू समझने में विस्तार हुआ है।

खुद को तो आदर और सम्मान की चाह है किंतु हम किसी को आदर, सम्मान और प्रेम नहीं देंगे क्योंकि हम बड़े हैं जबकि प्रत्येक को जीवन का सिद्वान्त ही बना लेना चाहिए कि जीवन के हर स्तर पर आदर, सम्मान और प्रेम यदि परोसा जाएगा तो निश्चित मानिए कहीं न कहीं से लौट कर हजारों के रूप में वापस मिल ही जाएगा।

बुजुर्ग शिकायतें करते हैं बहू और बेटा ध्यान नहीं रखते या जग भर में बहू-बेटों को कोसते रहते है किंतु कभी भीतर झांककर देखा है कि यह दूरियां तो उन्होनें युवावस्था या प्रौढ़ावस्था में खुद ही तय कर दी थी।
वृद्धावस्था में शारिरीक और मानसिक रूप से खुद को असहाय पाते है तब फिर किसी सहारे स्नेह व उम्मीद की आवश्यकता महसूस होती है। यदि वृद्धावस्था में दुखी नहीं होना चाहते है तो यह बात युवावस्था में ही समझ लेनी चाहिए।

वृद्धावस्था में बच्चों, बेटियों या बहुओं को कोसने से अच्छा है कि युवावस्था से संतुलित व्यवहार की आदतें प्रसारित की जाए तो निश्चित तौर पर कोई बेटा, बेटी या बहू घर के बड़े बुजुर्गों की किसी भी प्रकार की अवहेलना कर ही नहीं सकते।
बच्चे भी जैसा देखेंगे वैसा ही आगे भी करेंगे। रिश्ते निभाना बड़ी बात नहीं किंतु रिश्तों को संवारें रखना बड़ी बात होती है।
बदलते समय के साथ बुजुर्गों की देखभाल के लिए ओल्ड ऐज होम, सरकार, समुदाय एवं कई स्वयंसेवी संस्थाएं तैयार रहती है किंतु कितना दुखद सत्य है अपनों के होते हुए भी परायों में प्रेम, स्नेह, दुलार व आत्मियता ढूंढ़नी पड़ रही है। पीड़ा जनक अनुभूति होती है जब स्वयं को असहाय व असक्षम पाते हैं और उस वक्त अपना ही कोई अपने पास नहीं होता।

सामाजिक और पारिवारिक ढ़ाचा बदल रहा है और बुजुर्गों की देखभाल व जिम्मेदारी में भी अपवाद स्वरूप कई समस्याएं और कठिनाईयां आ रही है जिससे मुंह भी नहीं मोड़ा जा सकता है।
घर के बाहर नहीं घर के भीतर ही घर के बुजुर्गों के लिए जगह बनानी होगी। युवाओं को समझना होगा और इस सन्दर्भ में शोध भी यही कहते हैं कि दादा-दादी और नाना-नानी के साथ रहते हुए जो बच्चे बड़े होते है उनमें भावनात्मक उतार-चढ़ाव से जुड़ी समस्याएं कम होती है। ऐसे बच्चों में सुरक्षा की भावना अधिक होती है और विपरित स्थितियों में भी आसानी से उबरने की क्षमता रखते हैं और यही बच्चे जब बुजुर्ग होते है तब इनमें अवसाद जैसी मानसिक परेशानियों की समस्याओं की संभावना कम होती है।
बुजुर्ग होने से पहले ही युवाओं को अपने तौर-तरिके बदल लेने चाहिए।

सैकड़ों लोगों से बात की तो कई लोगों के तो ऐसे विचार सामने आए कि बुजुर्गों की देखभाल से इन्हें कभी खुशी नहीं मिलती। इसके कारण चाहे कुछ भी रहे हों किंतु इस बात से सीधा सत्य यही छिपा है जो पीछे से मिला है वही गलत यदि आगे भी परोसते रहे तो याद रखिए यही परोसन आगे भी अपने लिए तैयार समझिए।
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