बच्चा कहना नहीं माने तो क्या करें-बच्चे बहुत जिद्ध करते हैं कहना बिल्कुल नहीं मानते ऐसा अक्सर माता-पिता द्वारा शिकायते की जाती है। छोटे बच्चों में कुछ गंभीरताएं जल्दी नहीं आती किंतु वे अपनी तर्क संगत सोच का उपयोग करना शुरू कर देते हैं। कई बार अपरिपक्वता और तर्कहीन विचारों के कारण बच्चे कई बार सीमाएं लांघ जाते हैं।
बच्चों को कुछ भी कहों वे जैसा सुनेंगे उसका उल्टा करेंगे। माता-पिता को चाहिए कि बच्चों की अनुचित बात पर ना भी कहें हर बात मानी जाए जरूरी नहीं यह बात बच्चों को व्यवहारिक रूप से समझा देनी चाहिए।

बच्चों द्वारा बड़ों की बताई बातें अक्सर नहीं मानना। सही रास्ता बताने पर भी विपरीत चलना। ऐसी बाते बच्चों व पेरेंट्स के लिए कई बार मुसीबतें खड़ी कर देता है।
आजकल असभ्य भाषा का प्रयोग भी बच्चे आसानी से कर लेते है। जैसे आई हेट यू, आप बात-बात में परेशान करते हो, मेरी मर्जी, मेरी इच्छा, आप गंदे हो, आप पागल हो क्या या किसी बात पर मना करने पर हां ऐसा ही होगा या बार-बार होगा या मैं तो ऐसा ही करूंगा/करूंगी। बच्चों का कहना नहीं मानना कोई विकार नहीं है।

इन सब बातों व आदतों के प्रति प्रथमतः घर का वातावरण, बदलाव या अन्य कोई उठापटक हो सकती है। बच्चों में बदल रहा व्यवहार के पीछे के कारणों को ढूंढ़े और उसे दूर करने का पहले प्रयास करें।
ऐसी बातों की पुनरावृत्ति नहीं हो जिसके कारण बच्चे ऐसा व्यवहार करते है इसके प्रति माता-पिता को पूरी तरह सतर्क रहना चाहिए।

व्यवस्तम जीवन शैली में भी बच्चों के साथ खुशहाल और आनन्दित कर देने वाले पल रोज बिताने चाहिए।
असुरक्षा की भावना के कारण भी बच्चे जिद्वी व उत्पाती बन सकते हैं।
कभी-कभी माता-पिता को भी बच्चों के साथ बच्चा बनकर उनके साथ खेलना चाहिए। धीरे-धीरे बच्चों के व्यवहार में परिवर्तन जरूर आने लगेगा।

बुरी आदतों के परिणाम के बारे में गुस्सा व चिल्लाहट को छोड़कर प्यार से बैठकर धीरे से समझाना चाहिए जिससे बच्चों में सकारात्मक दृष्टिकोण का निर्माण होने लगता है।
बच्चों को दण्ड या सजा देना समस्याओं का समाधान बिल्कुल भी नहीं है। भावनात्मक स्तर पर बच्चों के व्यवहार को बदला जा सकता है। छोटी-छोटी जिम्मेदारी बच्चों को देना शुरू करें।
बच्चों को उनकी पसंद का सामान दिलाने, इनके साथ खेलने या बाहर घूमने जाने पर बच्चों के चेहरे की प्रतिक्रियाओं पर नज़र रखें कि बच्चे खुशी महसूस कर रहे हैं, हँस रहे है, चहक रहे हैं या क्रोधित है, गुमसुम है या चिड़चिड़ा व्यवहार करते हैं। पहले आप सब देखिए और समझिए फिर बच्चों को उसी अनुरूप देखिए, समय दें, समझाईए और जांचिए जिससे बच्चों में सकारात्मक रूप से व्यवहारात्मक रूप से बदलाव आ सकें।

बच्चा कहना नहीं माने तो प्रेम, आत्मियता और बच्चों के साथ बिताएं गए सकारात्मक पल बच्चों में बदलाव जरूर लेकर आता है। बच्चे तो मिट्टी के कच्चे घड़े जैसे होते हैं इन्हें जैसा ढ़ालेंगे प्रथमतः वे वैसा ही रूप लेंगे।
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