दाम्पत्य सुख के लिए मूल बंध का अभ्यास अवश्य करें-मूल बंध-सुखपूर्वक अर्थात सुविधापूर्वक बैठे जाने वाले आसन में बैठे। एडी से गुदा व जननांग के बीच के भाग को दबाते हुए संकुचन करना मूल बंध कहलाता है। एडी को सर्विक्स (योनी और गर्भाशय का संगम स्थल) या पेरिनियम (गुदाद्वार व जननांग के बीच का खाली स्थान) पर स्पर्श करे। गर्दन, मेरूदण्ड बिल्कुल सीधा रखे। कंधा व बाहें शिथिल रहे। ज्ञान मुद्रा या चिन मुद्रा की स्थिति में रहे। आँखें कोमलता से बंद करे।

सामान्य गति से श्वास-प्रश्वास करे। दीर्घश्वास लेकर अन्तःकुंभक करे। जालंधर बंध लगाए। अपने चित्त को सर्विक्स या पेरिनियम पर केन्द्रित करें। सर्विक्स या पेरेनियम को ऊपर की ओर संकुचित करे अर्थात् खींचे। क्षमता व सामर्थ्य अनुसार रूके। धीरे-धीरे संकुचन को शिथिल करे। जालंधर बंध से मुक्त करे। सिर को ऊपर उठाकर गहरी श्वास बाहर निकाले।

दाम्पत्य सुख-स्त्री-पुरूष द्वारा मूलबन्ध का निरन्तर अभ्यास करने से असीम आनन्द का समावेश जीवन में होता है। गुदा मार्ग की मांस पेशियों को भीतरी बल द्वारा ऊपर की ओर यथाशक्ति खींचे रखना ही मूलबन्ध कहलाता है। इस अभ्यास से काम शक्ति तीव्र होती है। धातु दौर्बल्यता, शीघ्र पतन, इन्द्रिय दोष में लाभयदायक है। योनि मार्ग का ढीलापन दूर होता है। एकाग्रता बढ़ती है।
दाम्पत्य सुख के लिए मूल बंध का अभ्यास अवश्य करें, योग और आसान शरीर की मांसपेशियो को लचीला और सुदृढ़ बनता है। नियमित अभ्यास से जीवन में आनंद और ख़ुशी बसाई जा सकती है। योग और आसान कठिन नहीं है , बस जरूरत है थोड़ी सी इच्छा शक्ति की तथा खुद पर विश्वास की। मूलबन्ध के नियमित अभ्यास से सर्विक्स और पेरोनियम के आस – पास की मांसपेशियों में सक्रियता और संकुचन पैदा होता है जिससे माँसपेशिया स्वस्थ और मजबूत बनती है। मूलबन्ध के नियमित अभ्यास से और भी कई रोग दूर होने लगते है। स्वस्थ और आनंदित जीवन ही सुखद परिवार बनता है।
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