व्यायाम योग तथा आसन जरूरी है | Exercise yoga and asanas are necessary.

व्यायाम योग तथा आसन जरूरी है –

वायु स्नान

भरपूर ऑक्सीजन पर्यावरण में स्थित रहते हुए भी मृत्यु होती है तो यह बात तो तय है कि कोई न कोई शक्ति है जो व्यक्ति को जीवित बचाए रखती है और वह है जीवनी-शक्ति जो शरीर को सक्रिय और स्वस्थ बनाए रखती है। इसकी कमी या समाप्ति पर शरीर समाप्त हो जाता है अर्थात् मृत्यु हो जाती है। आयु का बढ़ना और घटना जीवनी-शक्ति पर निर्भर है। वायु स्नान से जीवन शक्ति बलवती होती है। स्वाभाविक रूप से आयु में वृद्धि होती है। सबसे सरल एवं लाभकारी व्यायाम है प्रातःकाल तथा सांयकाल की सैर। भ्रमण से सजीव अणुओं का जन्म व विकास होता है। यह शरीर को गिरने व दुर्बल होने से रोकता है। शरीर के सम्पूर्ण अवयवों को रक्त पहुँचता है।

सैकड़ों रोगों की निःशुल्क दवा है प्रातः तथा सांयकाल सैर। यह कदापि आवश्यक नहीं कि रोग होने पर ही सैर के लिए निकला जाए। स्वस्थ व्यक्ति के लिए भी यह बहुत अच्छा तथा स्वास्थ्यवर्धक  व्यायाम है जिसका अभ्यास बचपन से ही किया जाना चाहिए। खुले आसमान के नीचे विभिन्न प्रकार के खेल जैसी गतिविधियां बच्चों में नवीन ऊर्जा का प्रवाहन करती है। भ्रमण वायु स्नान का सबसे अच्छा, सरल व सुलभ माध्यम है। सैर के लिए शौचादि क्रिया से निवृत्ति तथा दाँत माँजने के पश्चात् ही निकलना चाहिए। हल्के व आराम दायक वस्त्र तथा जूतों का इस्तेमाल करें। वस्त्र ऐसे पहने कि खुली हवा का स्पर्श त्वचा से अधिकतम हो सकें।

भ्रमण के दौरान वार्तालाप, बीच-बीच में आराम, कानों में ईयर फोन डालकर कर संगीत सुनना कतई न करें। टहलना है तो बस अकेले ही टहलिए। अनावश्यक ध्वनि व वार्तालाप से दूर रह कर भ्रमण करें। प्रवाहमान वायु के संगीत से ताल मिलाकर भ्रमण करिए। किसी भी प्रकार की चिंता व मानसिक तनाव साथ न रखें। हवा की सुगंध बसाते चलिए। भले ही नाम स्मरण चलता रहे। कितना टहलना चाहिए इसके लिए निश्चित नियम नहीं है। सामर्थ्य एवं क्षमता अनुसार 2-3 किलोमीटर या अधिक एक समताल अर्थात् एक चाल से भ्रमण करें।

व्यायाम योग तथा आसन जरूरी है | खुले आकाश के नीचे हल्की दौड़, खेल, व्यायाम, प्राणायाम आदि भी वायु स्नान के अच्छे माध्यम है। सामान्य व्यक्ति को अधिक तेज या बहुत धीमे नहीं चलना चाहिए। भ्रमण के समय मध्यम तथा संतुलित चाल रहनी चाहिए। भ्रमण के दौरान दीर्घश्वास का अभ्यास भी करते चले यह स्वास्थ्य निर्माण के लिए अद्भुत औषधी स्वरूप है। एक श्वास के साथ प्रथमतः आठ कदम अवश्य चलें। चार-पाँच कदम तक श्वास रोकें फिर आठ कदम तक चलते हुए श्वास बाहर निकालने का अभ्यास करें। ऐसा करने पर यदि थकान महसूस हो तो संख्या कम करिए किन्तु तनाव नहीं करिए। उच्च रक्तचाप तथा हृदय रोगी श्वास रोकने की क्रिया न करें वे अपनी क्षमता अनुसार दीर्घ श्वासोश्वास करें।

टहलिए आनन्द के साथ, तनाव व अनर्गल विचारों के साथ कभी नहीं। ओस से भीगी घास पर नंगे पैर और कम कपड़ों में घूमना हितकर है जिससे अधिक से अधिक अंगों पर स्वच्छ व निर्मल वायु का स्पर्श पा सकें। खुले आकाश के नीचे हल्का व्यायाम भी साथ ही साथ किया जा सकता है। स्वच्छ निर्मल वायु में भ्रमण से शरीर व मन दोनों रोग मुक्त रहते हैं। प्रातः भ्रमण स्वास्थ्य के लिए संजीवनी है। सुबह की हवा में प्रदूषण नहीं होता अपितु शुद्धता होती है। सूर्य की लालिमा तेज व ऊर्जा प्रदान करने वाली होती है। सैर करने पर कैलोरी खर्च होती है। मोटापा कम होता है। मांसपेशियां मजबूत होकर शरीर से अनावश्यक चर्बी कम होने लगती है। रक्त शुद्धीकरण प्रक्रिया बलवती होती है जिससे शुद्ध ऑक्सीजन प्रत्येक कोष को मिल पाती है। व्यायाम योग तथा आसन जरूरी है |

हृदय, रक्तचाप, नाड़ी-तंत्र, मधुमेह, अवसाद आदि रोगियों के साथ स्वस्थ व्यक्ति के लिए भी भ्रमण लाभदायक है। शारीरिक व मानसिक कमजोरी दूर होती है साथ ही साथ हडिड्डों का घनत्व भी बढ़ता है। दैनिक तौर पर कम से कम तीन से चार किलोमीटर अन्यथा सप्ताह में पाँच दिन तो अवश्य ही सैर करना स्वास्थ्य के लिए बहुत आवश्यक तथा लाभदायक है।

प्रातः भ्रमण के लिए भीड़, कोलाहल या उजाड़ सा स्थान न चुने। भ्रमण वहीं हो जहाँ प्रकृति का सामीप्य एवं स्वच्छंदता महसूस हो इसके लिए खुला, शांत और हरा-भरा स्थान बहुत अच्छा रहता है। उचित-अनुचित विचारों को दूर रखते हुए भ्रमण पर ही ध्यान केन्द्रित करते हुए कदम सैर को बढ़ते रहे साथ ही साथ दीर्घश्वास भी लेते रहने का अभ्यास नियमित चलता रहे।

भ्रमण से पूर्व तथा भ्रमण के पश्चात् एक-दो ग्लास पानी जरूर पीए जिससे शरीर का तापमान सामान्य बना रहें। आयु, क्षमता व समय के अनुसार ही सैर होनी चाहिए। हड़बड़ाहट या मात्र औपचारिकतावश या खाना-पूर्ति के लिए भ्रमण न हो। अपने हाथों और पैरों का उठाव समताल रहें जिससे भ्रमण भी एक तालमय हो अर्थात् गति एक ताल में रहें, एक समान रहे।

रोगी चिकित्सक की परामर्श द्वारा ही भ्रमण पर निकलें। शुद्ध वायुस्नान अर्थात् प्राण अथवा जीवनी-शक्ति में वृद्धि। प्रतिदिन जितना भोजन और पानी पीया जाता है उसका सात-आठ गुना वायु का सेवन किया जाता है। टहलने के लिए भी जीवन में कुछ क्षण निकालिए। अन्तः एवं बाहरी दोनों ओर सफाई हो जाती है।

त्वचा में स्थित छिद्रों से भी ताजी वायु शरीर में प्रविष्ट होती है। सरल और स्वाभाविक रूप से की गई सैर से शरीर सशक्त हो जाता है। पैदल चलना बुरा नहीं है इसे फैशन और पेशन बनाइए।

सरल सुलभ व्यायाम है सैर इससे शरीर की 200 माँसपेशियों की हल्का व्यायाम हो जाता है। सूर्योदय से पूर्व सभी दिशाओं की वायु सभी प्रकार के दोषों से मुक्त होती है। प्रदूषण अथवा प्रदूषित वायु में

टहल-कदमी कभी नहीं करें अन्यथा पाचन, श्वसन व संक्रमण संबंधी रोग प्रकट हो जाते है। इस बात का सदैव ध्यान रहे कि नासिका द्वारा 21 इंच की दूरी तक की वायु ग्रहण की जाती है। पंखे तथा एसी की वायु का अधिक प्रयोग करने से बचे। यह वात, पेट तथा जोड़ संबंधी रोग उत्पन्न कर देता है।व्यायाम योग तथा आसन जरूरी है |

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