पेट की अग्नि कौन-कौन सी है-शरीर में खाए हुए भोजन को पकाने और पचाने के लिए पेट में पाचक अग्नि काम करती है जिसे जठराग्नि कहा जाता है। जठराग्नि के भीतरी भाग को जठर (मेदा) कहा जाता है जिसमें स्थित अग्नि खाए हुए भोजन को पकाती और पचाती है।

उदर की अग्नि चार प्रकार की होती है। जैसेकि-
समाग्नि-
शरीर में वात-पित्त-कफ यदि समान स्थिति में होते हैं तब समय पर खुल कर भूख लगती है। खाए हुए भोजन का पाचन अच्छा होता है। सुबह और शाम मल विसर्जन क्रिया आराम से होती है। शरीर में ताजगी, स्फूर्ति व बल का अनुभव होता है। इस स्थिति को समाग्नि कहा जाता है।

विषमाग्नि-
वात प्रकोप के कारण पाचक अग्नि विषम हो जाती है जिसके प्रभाव से कभी पाचन होता है तो कभी पाचन नहीं होता जिसका परिणाम दर्द, अतिसार, पेट में भारीपन, गुड़गुड़ाहट, डकारें, बैचेनी व भूख नहीं लगना होता है। इस स्थिति को विषमाग्नि कहा जाता है।
तीक्ष्णाग्नि-
वात प्रकोप के कारण पाचक अग्नि तेज हो जाती है जिसके परिणामस्वरूप भोजन करने पर भी तृप्ति का आभास नहीं होता और बार-बार तथा जल्दी-जल्दी भूख लगने की स्थिति हो जाती है। इस स्थिति को तीक्ष्णाग्नि कहा जाता है और आयुर्वेद में इसे भस्मक रोग भी कहा जाता है।

मंदाग्नि-
कफ का प्रकोप होने के कारण पाचक अग्नि धीमी हो जाती है अर्थात् मंद पड़ जाती है जिससे भूख कम लगती है। थोड़ी सी मात्रा में खाया हुआ भोजन भी देर तक पच पाता है। भोजन करने के बाद बहुत देर तक पेट के साथ सिर में भारीपन व दर्द का अनुभव होता है। जठराग्नि मंद पड़ जाती है। इस स्थिति को मंदाग्नि कहा जाता है।
भोजन का पाचन मंद हो जाने से आलस्य, शिथिलता, उत्साहीनता, अरूचि, थकान, घबराहट और बैचेनी होने की शिकायत रहती है।

पेट की अग्नि असंतुलित रहने और दूषित व अंसतुलित आहार-विहार के कारण पेट के रोग पैदा हो जाते हैं। पेट के रोगों से दूर रहने या रोगों को दूर करने के लिए संतुलित जीवन-शैली का पालन करना चाहिए और मंदाग्नि के कारणों को दूर करने का सतत प्रयास करते रहना चाहिए।
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