सूर्य नमस्कार क्यों करना चाहिए? जानिए बहुतेरे लाभ-
चुस्त-दुरूस्त रहने व छरहरा बने रहने के लिए बहुत कुछ प्रयास किए जाते है। प्रतिदिन नियमित तौर पर सूर्य नमस्कार शरीर को हृष्ट-पुष्ट व स्वस्थ रखने में प्रभावकारी व लाभदायक है।

इसमें अनेक आसनों का सार छिपा हुआ है। सूर्य नमस्कार में 12 तरह के आसन और मंत्र निहित है। प्रत्येक मंत्र का अर्थ है-सूर्य को मेरा नमस्कार। सूर्य नमस्कार के एक चरण में 12 आसनों के दो क्रम होते हैं अर्थात् एक क्रम में दाएं पैर तथा दूसरे क्रम में बाएं पैर का प्रयोग किया जाता है।

सूर्य नमस्कार योग आसनों के अभ्यास के पश्चात् किया जाना चाहिए। इसके अभ्यास के बाद किसी अन्य योग आसन का अभ्यास नहीं किया जाना चाहिए।

सूर्य मुद्रा शरीर के अग्नि तत्त्वों को संचालित करती है। इसके अभ्यास से शरीर के अवयव, जोड़, मांसपेशियों में लचीलापन आता है।

दीर्घायु, एकाग्रता व जागरूकता बढ़ती है। रीढ़ की हड्डी मजबूत होती है तथा मानसिक शांति प्राप्त होती है।
पेट व त्वचा के रोग दूर होते है।
बाल सफेद होने से रूकते हैं।
वजन कम होने के साथ नियंत्रित भी रहता है।
नेत्र ज्योति बढ़ती है।
छोटी-बड़ी सभी नाड़िया क्रियाशील होती है जिससे आलस्य, अतिनिद्रा व विकार समाप्त होने लगते है।
प्राणशक्ति व रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है।
शरीरीय रासायनिक क्रियाएं पुष्ट होती है।
अनैच्छिक क्रियाओं पर नियंत्रण के साथ शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य में वृद्धि होती है।
अनुकंपी तथा परानुकंपी तंत्र संतुलित रूप से सक्रिय होता है।
रक्तसंचार तथा वायु का प्रवाह संतुलित होता है।
मेरूदण्ड के रोग व मानसिक विकारों का निराकरण होता है।
प्रातः नियत समय पर नियम से सूर्य नमस्कार के अभ्यास से विटामिन डी की प्राति होती है।
कुशल योग चिकित्सक की देख-रेख में सही विधि से ही सूर्य नमस्कार का अभ्यास किया जाना चाहिए अन्यथा दुष्परिणाम भी प्राप्त हो सकते हैं।
कमर, रीढ़, मेरूदण्ड की समस्या, सर्वाइकल व स्लीपडिस्क से ग्रस्त रोगी सूर्य नमस्कार न करें।
10 वर्ष की आयु से आजीवन तक सूर्य नमस्कार क्षमता व सामर्थ्य अनुसार किया जा सकता है।
सूर्य नमस्कार संधिकाल (सूर्योदय एवं सूर्यास्त) में ही किया जाना उपयुक्त है।
सूर्योदय का समय इसके अभ्यास के लिए अति उत्कृष्ट है।
इसका अभ्यास भूखे पेट किया जाना चाहिए। सूर्य अस्त होने के समय पर भी सूर्यनमस्कार किया जा सकता है। सूर्यनमस्कार के बाद कोई अन्य आसन न करे। कायोत्सर्ग अर्थात् विश्रामासन किया जा सकता है।
सूर्य नमस्कार न करें-
तेज धूप व देर रात्रि में सूर्य नमस्कार न करें।
मासिक धर्म, गर्भावस्था, प्रसूति काल व रजनोवृत्ति के समय सूर्य नमस्कार न करें। उच्च रक्तचाप, हृदय,
नेत्र, मधुमेह रोगी सूर्य नमस्कार अभ्यास न करें।
बुखार, कब्ज,घुटने, जोड़, पेट व सर दर्द में अभ्यास न करें।
अब हम जान गए है कि सूर्य नमस्कार क्यों करना चाहिए?
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