हम कैसा काम करते है यह इस पर निर्भर है कि मनुष्य के मस्तिष्क का विकास जातिवृत्तीय ढंग से हुआ है जो तीन विशेष और भिन्न सिस्टम में बंट गया है। रेप्टीलियन ग्रंथि, पेलियोमैमेलियन ग्रंथि और नियोमैमेलिन ग्रंथि। इन ग्रन्थियों में हर एक की अपनी विशेष जेनेटिक प्रोग्रामिंग होती है।

मानव मस्तिष्क में रेप्टीलियन ग्रन्थि और पेलियोमैमेलियन ग्रंथियों के अधिक सक्रिय होने के कारण अपराधी, बलात्कारी, मानसिक रूप से भ्रष्ट, आतंकवादी और समाज तथा देश के लिए विनाशक सिद्ध होते हैं।

रेप्टीलियन ग्रंथि जिसे आर कॉम्पलेक्स और रेप्टीलियन मस्तिष्क भी कहा जाता है। यह भौतिक अवस्था कायम करने के लिए जिम्मेदार है। इस ग्रंथि का संबंध आक्रामक व्यवहार, पलटवार, प्रजनन, वर्चस्व, अपने आस-पास स्थान की चौकसी व कर्मकांडीय कृत्य आते हैं ऐसे व्यवहारों का संबंध अपना अस्तित्व बचाए व बनाए रखने की विचार प्रक्रिया तथा स्वस्फूर्त व्यवहार से है।

पेलियोमैमेलियन ग्रंथि दिमाग का भावनात्मक व सामाजिक मेधा का केन्द्र होता है। प्रेम, नफरत, सुख, कुढ़न, यौन संतुष्टि, लगाव व दुःख जैसे भाव इस ग्रंथि से पैदा होते हैं। किसी भी परिस्थिति का सामना करने या किसी के सम्पर्क में आने पर पैदा होने वाले एहसास इस ग्रन्थि के द्वारा ही होते हैं।

नियोमैमेलिन ग्रंथि की सरंचना स्तनपायी जीवों में पाई जाती है यह सेरीब्रल नियोकॉर्टेक्स का प्रतिनिधित्व करती है। इस ग्रंथि के द्वारा ही आध्यात्मिकता और बौद्धिकता का समावेश, प्रवाहन व संचालन होता है। यह ग्रंथि सबसे बड़ी, विकसित और धनी होती है और बड़े ही दुर्भाग्य की बात है कि मनुष्य इस ग्रंथि का सबसे कम इस्तेमाल करता है। यह ग्रंथि ही मनुष्य को पशु के दिमाग से अलग करती है।
रेप्टीलियन ग्रंथि और पेलियोमैमेलियन ग्रंथियों द्वारा संचालित व्यक्ति अर्थात् इनकी सक्रियता से ग्रस्त व्यक्ति आपराधिक प्रवृत्तियों में लिप्त, मानसिक रूप से भ्रष्ट, बलात्कारी, आतंकवादी या समाज व देश के लिए कष्ट कारक बन जाता है।

बुरी आदतों, व्यवहार व बुरे प्रभाव से बचने के लिए अहिंसक ताकत को जगाना होगा। मस्तिष्क की सकारात्मक ग्रंथियों को सक्रिय करना होगा। व्यक्ति की क्षमताओं को दुबारा तलाशना होगा अन्यथा धीरे-धीरे मस्तिष्क का क्षरण होने लगता है और अल्जाईमर रोग भी पनपने लगता है। हम कैसा काम करते है और यह किस बात पर निर्भर है। यह समझना होगा।

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