ऊँ : उच्चारण – रोगों को कैसे दूर भगाता है यह जानने के लिए स्वयं को अभ्यासित करके अनुभव करें। वैज्ञानिक जो कभी ऊँ के महत्त्व को नकार रहें थें वे भी अब स्वर विज्ञान की शाखा में इस चमत्कारी एकाक्षरी बीज मंत्र ऊँ की महत्ता जान गए है और निरंतर इसके प्रभाव के सकारात्मक परिणामों को प्राप्त कर रहे हैं।

ऊँ का संबंध किसी भी धर्म विशेष से नहीं है बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से है। हर धर्म का प्रारम्भ और अंत ऊँ हैं। हर धर्म में ऊँ शब्द का प्रकटीकरण है।

लाखों वर्षों पूर्व ़ऋषियों, गुरूओं और मुनियों ने ऊँ का सागर बहाया है और शोधकर्ताओं को भी इस एकाक्षरी बीज मंत्र ऊँ पर निरंतर शोध दर शोध करने को प्रेरित किया है। गीता में भी लिखा है ऊँ ही ब्रह्मस्वरूप, सृष्टि का प्राण, अध्यात्मक का प्रारम्भ, मध्य और अंत है।
हावर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ हर्बर्ट बेसन पिछले 20 वर्षों से ऊँ स्वर व ध्वनि के विभिन्न स्तर पर शोध कर रहे है इनके द्वारा बताया गया कि ऊँ की ध्वनि अनेक बीमारियों को दूर करने में प्रभावशाली उपचार है।
ओंकार थेरेपी चेतन और अचेतन मन पर सकारात्मक प्रभाव डालती है।
मन और शरीर के रोगों को दूर करती है।
ऊँ शब्द के उच्चारण में तीन वर्ण अ, उ तथा म का समावेश होता है।

“अ” वर्ण का उच्चारण से दमा का रोग शांत होता है।
आलस्य दूर होता है।
तेज, ओज व शक्ति बढ़ती है।
“उ” वर्ण का उच्चारण से यकृत, पेट, आंतें व पेट की भीतरी अंगों पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता हैं। शरीर के सारे दूषित पदार्थ मल द्वारा बाहर निकल जाते है तथा कब्ज भी नहीं रहती है।
“म” वर्ण का उच्चारण से मानसिक शक्तियों का विकास होता है तथा अवसाद व तनाव आदि दूर होता है।

ऊँ का उच्चारण शांत, स्वच्छ व प्रदूषण रहित वातावरण में किया जाना चाहिए जिससे कि एकाग्रता व संतुलन से ऊँ का उच्चारण किया जा सकें। निरंतर प्रयोग व अभ्यस्तता के बाद एकाग्रता की सीमा बढ़ जाती है तब शोरगुल वाले स्थान में भी ऊँ का शांति पूर्ण उच्चारण करने में समक्ष हुआ जा सकता हैं। ऊँ : उच्चारण – रोगों को कैसे दूर भगाता है यह जानने के लिए स्वयं को अभ्यासित करके अनुभव करके ही इसका महत्त्व समझा जा सकता है।
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