ऊँ मंत्र जाप ऐसे किया जाना चाहिए–ऊँ मंत्र का जाप करने के लिए सुखासन, वज्रासन, पद्मासन, सिद्वासन या कोई भी ऐसा आसन जिसमें सरलता व सुखपूर्वक स्थिति में बैठा जा सकें, चुनाव करके बैंठे।

सबसे पहले आँखें कोमलता से बंद करके सामान्य गति से श्वास बाहर निकालें।
अब दीर्घ अर्थात् गहरा श्वास फेफड़ों में भरें और बिल्कुल मंद गति व ध्वनि से ऊँ का उच्चारण करें।
उच्चारण का आधा भाग “अ”, चौथाया भाग “उ” तथा चौथाया भाग “म” के उच्चारण में लगाएं।

“म” के उच्चारण की समाप्ति भ्रमर गुंजर की भांति समाप्ति पर ही निश्चित होना चाहिए। “म” के उच्चारण की अंतिम अवस्था में जब अनुभव होने लगे कि अब ष्शरीर में ष्शक्ति तथा फेफड़ों में वायु मात्र भी नहीं बची है तब शक्ति तथा सामर्थ्य अनुसार बाह्य कुंभक करें (उच्च रक्तचाप तथा हृदय रोगी कुंभक नहीं करें)। कुंभक की अवस्था में पेट की मांसपेशियों को भीतर की ओर कुछ क्षण खींच कर रखें। आँखें कोमलता से बंद ही रहेगी। बंद आँखों से पेट के भीतर प्रवाहित अनुभूतियों व ध्वनियों पर अपनी चेतना से ध्यान लगाकर महसूस करें।
यह जान लें कि श्वास सही ढंग से लेना है अर्थात् श्वास लेते समय पेट की मांसपेशियां बाहर की ओर फूलती है और श्वास बाहर निकालते समय पेट की मांसपेशियां भीतर की ओर जाती है।
सृष्टि का प्रत्येक स्तर ऊँ है। ऊँ कण-कण में व्याप्त है। जीवन को शांत व सुखी बनाने के लिए ऊँ का उच्चारण करना चाहिए।
रोगों को दूर रखने, दूर भगाने व रोगों से मुक्त रहने के लिए ऊँ का सही विधि से उच्चारण करना चाहिए।
श्वास की सरगम ऊँ है। ऊँ रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।
सुंदर भावना, तन्मयता और एक लय के साथ मग्न होकर ऊँ का उच्चारण करना चाहिए।
ऊँ का उच्चारण बिल्कुल धीमे-धीमे व शांति से किया जाना चाहिए। उतावलावन या हड़बड़ाहट बिल्कुल नहीं करें।
ऊँ का उच्चारण शांत, स्वच्छ व प्रदूषण रहित वातावरण में किया जाना चाहिए जिससे कि एकाग्रता व संतुलन से ऊँ का उच्चारण किया जा सकें। निरंतर प्रयोग व अभ्यस्तता के बाद एकाग्रता की सीमा बढ़ जाती है तब शोरगुल वाले स्थान में भी ऊँ का शांति पूर्ण उच्चारण करने में समक्ष हुआ जा सकता हैं। ऊँ मंत्र जाप ऐसे ही किया जाना चाहिए ।

Great you had let me know the proper pronunciation of Om.