फेफड़ों को प्रदूषण और संक्रमित कणों से कैसे बचाएं?
प्रदूषण के असर से बचना चाहते है तो प्राकृतिक खाद्य पदार्थ अधिक मात्रा में खाने चाहिए।
सेहत के लिए प्रदूषण व संक्रमण दिन-प्रतिदिन भारी पड़ता जा रहा है नित नई बिमारियों का झमेला प्रकट होने लगा है। एक ओर मिलावट तो दूसरी ओर प्रदूषण तीसरी ओर कोरोना तो चौथी ओर दूषित जीवन-शैली चारों तरफ से समस्याएं ही समस्याएं बढ़ती ही जा रही है जोकि साधारण जीवन जीने के लिए भारी पड़ रही है।
श्वास के साथ गंदा प्रदूषण फेफड़ों में जाता है जोकि शरीर के अन्य अंगों के साथ फेफड़ों के लिए भी खतरनाक साबित हो सकता है किंतु इनके बुरे प्रभावों को प्राकृतिक खाद्य पदार्थों का सेवन और संतुलित जीवन शैली से दूर रखा जा सकता है-
विटामिन सी प्रदूषण के कारण हुए नुकसान को कम करता है। मौसम के अनुरूप उपलब्ध विटामिन सी वाले आहार जैसे आंवला, अमरूद, नीबू, शिमला मिर्च, हरी मिर्च, मौसमी व संतरा आदि की कम से कम एक मात्रा आवश्यक रूप से खाई जाने चाहिए।

अंगूर का सेवन फेफड़ों की कोशिकाओं की सूजन कम करने में सहायक है और इसके प्रयोग से फेफड़ों की कार्य क्षमता बढ़ती है।
ताजा पुदीना किसी न किसी रूप से रस व चटनी आदि के माध्यम से सेवन किया जाना चाहिए क्योंकि प्रदूषण की गिरफ्त में आने पर बचाव प्रक्रिया और प्रदूषण को शरीर से बाहर निकालने के लिए हमारा शरीर हिस्टेमाईन रसायन का स्राव करता है जिसके कारण नाक बंद होना, कफ और छींके आना आदि समस्याएं प्रकट होने लगती है। पुदीना में एंटीहिस्टेमाईन होता है जोकि एंटीडॉट का कार्य करता है।

कालीमिर्च या लौंग गले में कफ दूर करने तथा श्वास नली का संक्रमण दूर करने में सहायता करता है। लौंग का प्रयोग चाय व सब्जी आदि में किया जा सकता है। प्रदूषण से बचने के लिए एक कालीमिर्च या लौंग दांत के नीचे दबा कर रख लेनी चाहिए।

लहसुन रक्त प्रवाहित नलियों में लचीलापन लाता है और कड़ापन हटाता है।
केला व सीताफल पोटेशियम और विटामिन (विटामिन बी6) से भरपूर होता है और मेलेक्यूल्स का निर्माण करते हैं।पोटेशियम की कमी से श्वास लेने में तकलीफ होने लगती है इसलिए केला और सीताफल जरूर खाना चाहिए साथ ही इनके सेवन से ब्रोन्कायल मांसपेशियों के उत्तकों का कड़ापन भी दूर होता है।
हल्दी में स्थित करक्यूमिन गले की खराश, सूजन खाँसी, दमा और श्वास की बीमारियों को दूर करने में सहायक होती है।
ग्रीन टी में उपलब्ध पॉलिफिनॉल नामक एंटीऑक्सिडेंट फेफड़ों से प्रदूषित तत्त्वों को बाहर निकाल फैंकने में मदद करता है।
गाजर में स्थित बीटा केरोटीन फेफड़ों में पहुँचे विष जन्य तत्त्वों को दूर करती है साथ ही गाजर के प्रयोग से आँखों की रोशनी भी बढ़ती है।
सेब क्वसेंटिन और खेलिन नामक तत्त्व श्वास-प्रश्वास को सुगम बनाते हैं और सेब के प्रयोग से फेफड़ों की कार्यक्षमता में भी वृद्धि होती हैं।
अलसी में उपलब्ध ओमेगा-3 और फायटोस्ट्रोजन के एंटीऑक्सिडेंट गुण प्रदूषण की स्थिति से लड़ने में शरीर की मदद करते हैं। एलर्जी व संक्रमण आदि से बचाव करता है।
कलौंजी में आयरन, कैल्शियम, सोडीयम, पोटेशियम, फाईबर, अमीनो एसिड व प्रोटीन खूब पाया जाता है। अस्थमा, खाँसी, कफ, दमा रोग के लिए यह रामबाण है। सुबह भूखे पेट या रात को सोने से पहले गर्म पानी के साथ हल्की भुनी हुई आधी चम्मच कलौंजी का सेवन करने से फेफड़े मजबूत होते है। फेफड़े संक्रमित होने से बचे रहते है। साथ ही कलौंजी एंटीऑक्सीडेंट है इसके प्रयोग से डायबिटीज, एसीडिटी, कैंसर, बालों के सभी रोग, कील मुहांसे, बुद्धि की कमजोरी, घुटनों व जोड़ों का दर्द तथा खून में खराबी आदि रोग आसानी से दूर होने लगते है।

अदरक का सेवन चाय, सब्जी या चटनी किसी भी रूप में करना चाहिए। इसका प्रयोग फेफड़ों को प्रदूषण के कणों से होने वाले नुकसान से बचाता है।
हमें प्रकृति का सम्मान करना है उसका साथ देना है प्रकृति हमारा साथ देगी। इन सबके साथ एक अहम् बात यह है कि स्वच्छ रहें और स्वस्थ रहें। भीड़-भाड़ वाली जगह पर जाने से बचें औरहाथ धोनें व मास्क पहनने का विशेष ध्यान रखें।
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