कभी खुद के साथ भी बैठिए (मौन)
प्रत्येक स्थान और समय बोलने के योग्य नहीं होते। बुद्धि में चलायमान विचारों की पुनरावृत्ति वाणी से अवश्य किया जाए ऐसा जरूरी नहीं। मौन रहना सीखिए अनावश्यक ऊर्जा खर्च न करें। जब व्यक्ति चुप रहता है तो उसकी स्वयं से बात हो जाती है। वक्त बे-वक्त बड़बोड़ा होने से बचें। मौन रह जाना बुरी बात नहीं। इससे आत्मिक उन्नति और बौद्धिक शक्ति प्राप्त होती है।
मौन और प्रार्थना दोनों से भाग्य तक बदला जा सकता है फिर स्वास्थ्य क्या चीज है। बाण से छूटा तीर और मुहँ से निकले शब्द दोनों वापस नहीं लौटते। अधिक बोलना तकलीफ देह हो सकता है। मौन बातचीत की एक महान् कला है। बोलने में समझदारी से काम लेना वाकपटुता से अधिक अच्छा है। वाणिक आचार-विहार हेतु मौन का अभ्यास व प्रयोग करते रहना चाहिए। मौन रहकर ही पूर्व में किए गए कार्यों पर विचार किया जाना चाहिए। कुछ घंटों का मौन भी बहुत लाभकारी हो सकता है।
कर्म होते रहें और अभ्यास होते रहें तो कुछ भी कठिन नहीं। ऊर्जा के व्यर्थ बहने से बचाव होता है। मौन रहने से बिगड़ते काम तथा व्यवहार सुधर जाते हैं, संवेदनशीलता बढ़ती है, दृष्टि, सोच व भावनाओं में बदलाव हो जाता हैअर्थात् मौन कई विपदाओं से बचा लेता है।

हास्य का पात्र बनने से अच्छा है मौन रहना सीखा जाए। कुछ बातें समझ से बाहर होने पर चुप रहना ही श्रेष्ठ है। कितना अर्थहीन और कितना सारगर्भित बोलते है इसकी अनुभूति होने के बाद आत्ममंथन स्वतः हो जाता है।
स्वयं को सिद्ध करने के लिए झगड़ा व विवाद से बचने में मौन अत्यंत सहायक है। अनेक बार स्वयं के बोले गए शब्दों पर खेद होता है। आवश्यकतानुसार बोलने पर 90 प्रतिशत झगड़े स्वयं खत्म हो सकते है। उतना ही बोलने का प्रयास हो कि जितना बोलने से काम भर चल जाए। हम भविष्य की भावना से अधिक जीते है, सोते, जागते वचलते-चलते भी चिंता में डूबे है इसलिए निराशावादी अधिक रहते है। मौन वर्तमान का दृष्टाभाव कराता है जिससे सकारात्मक प्रवृत्ति बढ़ती है। चंचलता के कारण दिन में अनेक बार झूठ बोले जा सकते है जोकि नकारात्मक ऊर्जा का उत्पादक है।
मौन से कायाकल्प हो जाता है। असीम शांति, प्रेम और आनन्द हासिल किया जा सकता है और अनेक दुर्गणांे, दुष्प्रभावों, समस्याओं और दुःखों से बचा जा सकता है। मौन रहने वाला व्यक्ति अधिक बुद्धिमान समझा जाता है।
खामोशी!चुप!चुपचाप! और मौन! सभी बुद्धिमानी का सबूत है। बच्चों को भी चुप रहने और बोलने के समय का अंतर पहचानना आना चाहिए। शांत-चित्त व मौन के प्रभाव में रहकर कभी स्वयं की जाँच करें तो आसानी से स्वयं ही स्वयं की कमियां देख पाएंगे। किसीसलाहकर के पास महंगी सलाह के लिए जाने की जरूरत भी नहीं रहेगी। कई बातों में सुधार की गुंजाईशे खुद-ब-खुद बढ़ जाती है क्योंकि स्वयं का मूल्य जिस दिन पहचान लिया उसी दिन से अपना मूल्य समझ आने लगता है।
उम्र बढ़ने की प्रक्रिया रूक जाती है जब गुरूत्वाकर्षण से बाहर हो जाते है।
शरीर पर निश्चित दबाव निरन्तर पड़ता है जिसके कारण जमीन निरंतर हमें खींचे रहती है शरीर की गतिविधियां भी अनवरत चलती रहती है किन्तु साथ ही साथ इस गुरूत्वाकर्षण रूपी खिंचाव से लगातार लड़ाई भी अप्रत्यक्ष रूप से होती रहती है।
व्यक्ति की अधिकतम ऊर्जा इस लड़ाई में खिंच रही है अर्थात् बहुत अधिक ऊर्जा बेकार ही खर्च हो रही है। ऊर्जा का क्षय होने से रोकने के लिए सबसे अच्छा, सरल व सुलभ माध्यम बंद आंखों से मौन का अभ्यास करते रहना है। मौन व ध्यान अवस्था में शरीर तो गुरूत्वाकर्षण से बाहर नहीं किन्तु मन इसके प्रभाव से बाहर हो जाता है और ऊर्जा का संचालन नीचे धरती की ओर अधोगति न होकर उर्द्धवगति होने लगता है जिससे उम्र का प्रभाव शीघ्र दृष्टिगत नहीं हो पाता है।
कुदरत के इशारों को समझे व उनका पालन करें। सूरज कभी यह नहीं जताता कि मैं ऊर्जा व रोशनी सारे संसार को देता हूँ। चाँद-सितारें अपनी चमक के लिए कभी नहीं इठलाते। जमीन कभी नहीं कहती कि मैं संसार का पोषण करती हूँ और जीवन दायिनी नदियां भी यह नहीं बोलती कि सबको मैनें जीवन दिया। प्रकृति कभी नहीं जतलाती कि मैं ही पालनकर्ता हूँ। सब चुप है और चुपरह कर अपना-अपना कार्य शांति से संतुलित रूप से कर रहे हैं तो हम क्यों दूर रहें?
प्रातः तथा सायंकालिक भ्रमण से शरीर व मन दोनों स्वस्थ रहते है। प्रकृति के सामीप्य में विचरण करते हुए वैचारिक मौन पर विराम लगाकर भ्रमण करें। मौन का अभ्यास मन की शक्ति व सामर्थ्य बढ़ाकर सकारात्मक ऊर्जा में अभिवृद्धि करता है। स्वास्थ्य सुधार व याददाश्त में वृद्धि के साथ स्वयं के प्रति एकाग्रता, जागरूक व सचेत करती है।
मौन अवस्था जिससे शारीरिक व मानसिक गतिविधियां नियंत्रित रहती है। अविवेकपूर्ण व बिना सोचे-समझे कार्य करने से व्यक्ति स्वयं को रोक पाता है।प्रकृति की मूक वार्तालाप सुने! बोले कुछ नहीं! तथा बिलावजह वार्तालाप से बचे और अपना मुँह बंद रखना सीखे। सदैव योग में भी किसी भी क्रिया को करते समय मौन को अधिक महत्त्व दिया गया है। जब हम भीतर से खाली होंगे तभी प्रकृति की ताकत भीतर समाहित हो सकेगी। वाणी के असंतुलन से व्यक्ति मानसिक रूप से चिड़चिड़ा व समस्याग्रस्त हो जाता है।
यह नहीं भूलना चाहिए कि शारीरिक परिश्रम के बजाए बोलने में अधिक श्रम लगता है। गुस्से पर काबू रखने के प्रयोगों का प्रारम्भ बचपन से ही शुरू हो जाना चाहिए। अधिक बातुलता से व्यक्ति शारीरिक रूप सेमानसिक असंतुलन, प्यास की अधिकता, गला बैठ जाना, कण्ठ का सूखना, छाती में दर्द, निर्णय क्षमता में कमी, आकुलता व बैचेनी जैसी आदि अनेक व्याधियों सेपीड़ित हो जाता है।
उतावलापन, अधीरता और गुस्सा ऐसी चीजे है कि इनके आवेग में कुछ भी उल्टा-सीधा बोल दिया जाता अथवा कर दिया जाता है किन्तु मौन के साथ शब्दों को तोलकर बोला जा सकता है और यही समझदारी का सूचक भी है।
बात करने में निपुणता के लिए सबसे पहले जरूरी है कि सामने वाले की भी ध्यान से सुने। मुँह को बंद रखकर संतुलित बुद्धि से काम किया जा सकता है क्योंकि अधिक बोलने से गलत बातें निकलने की संभावना अधिक बलवती रहती है। अच्छा बोलने के लिए अच्छा सुनना जरूरी है जिस हेतु प्रयास, प्रयोग और अभ्यास बचपन से ही प्रारम्भ हो जाने चाहिए। मौन के अभ्यास के लिए निरन्तर दीर्धश्वास के प्रयोग चलते रहें।
दिन में स्वयं का आँकलन एक बार जरूर करें कि आज कितनी अर्नगल बातों पर बार-बार विचार किया, दोहराया गया, व्यर्थ बहस, क्रिया-प्रतिक्रिया की गई और इन सबका परिणाम क्या हुआ? सोचें और देखंे। सबकुछ स्पष्ट होता चला जाएगा। इसी प्रकार जिंदगी के पन्ने भी एक बार पलट कर देख लें कि कब-कब कितना-कितना अत्याचार खुद पर किया और बदले में कमाया बहुत सारा तनाव, चिंता, अवसाद, मानसिक उलझनें, अनिद्रा, उच्च रक्तचाप व अन्य रोग। कितना कमाया और कितनी ऊर्जा समाप्त की सबका विश्लेषण एक बार जरूर करें।
प्रश्न उठता है कि मौन का अभ्यास कैसे करें? सबसे सरल बात है कि चुप रहने का अभ्यास प्रारम्भ कर दें। अपनी श्वास को ही सुनने की आदत सर्वप्रथम डाल लें। साक्षी व समभाव रहकर कार्यविधि करें। सोचें नहीं और कहे नहीं। मन में चुप्पी का अभ्यास करते रहने से शरीर, चेहरे व आँखों से मौन झलकने लगता है। ज्ञानेन्द्रियों में स्थिरता आती है। अन्तःकरणशुद्ध होता है। काम, मोह, लोभ, भय, क्रोध, चिंता, आतुरता व व्यग्रता नहीं पनप पाती। सकारात्मक सोच के साथ जागरूकता का विकास होता है। मानसिक तथा वाचक मौन से सुखद निद्रावस्था प्राप्त होकर रोग प्रतिरोधक क्षमता में प्रकृतिशः वृद्धि होती है।
बोलने से हम संसार से जुड़ते है और मौन से खुद से जुड़ते है। आज ज्यादा से ज्यादा बोलने व विचारों से बातें करने का अभ्यास अधिक रह गया है।चुप रहना, कम बोलना या मौन रहना भूल से गए है। असंतुलित व असंयमित जीवन शैली में हम खुद की अवहेलना बड़ी आसानी से कर रहे है और याद आती भी है तो तब आती है जब शरीर की जीवनी शक्ति का हृास प्रारम्भ होने लगता हैअर्थात् रोगग्रस्त होने लगता है, तब तक बहुत सारी शारीरिक व मानसिक बीमारियों व व्याधियों से घिर चुके होते हैं।
रोज 10 मिनट बिना विचारों व वार्तालाप के स्वयं के साथ बैठिए। संगीत, पुस्तकें, मोबाईल, टीवी को कुछ मिनटों के लिए खुद से दूर रख कर,शारीरिक व मानसिक तौर पर जो चल रहा है उसे देखते चले…रूकना कहीं नहीं…देखते चले…वार्तालाप बिल्कुल न हों। सब चलचित्र की भांति आएंगे और एक-एक करके सब चले जाएंगे। अभ्यास होने पर मौन सफल हो जाएगा। सारे विचार धीरे-धीरे खत्म होने लगेंगे। इनके लेन-देन व आवागमन से कोई वास्ता न रखें। विचारों का शांत होना जरूरी है। विचारों की पकड़ को छोड़िए इन्हें पकड़ने की आदत न डालें। अर्नगल विचारों को शून्य करें।
प्राणशक्ति का व्यर्थ व्यय रोकिए। मौन के अभ्यास से एक ओर शब्दों का प्रयोग अच्छा किया जा सकता है तो दूसरी ओर अधिक बोलकर मुसीबत मोल लेने से बचा जा सकता है।जुबान को वश में रखकर कम बोलना, नहीं बोलना या जितनी आवश्यकता हो उसी अनुरूप वार्तालाप करना भी मौन के सदृश्य उपचार है। मन को स्थिर रखते हुए बुरे विचारों का त्याग करते रहने का अभ्यास चलते रहना चाहिए।
सोचें!समझे!विचारें! और तब बोलें! बिना मांगे दी गई क्रिया-प्रतिक्रिया का कोई विशेष मूल्य नहीं होता। ऊर्जा की क्षति रूकनी चाहिए। जितना आवश्यक है उतना ही बोलने की आदत डाल लेनी चाहिए। अच्छे विचार मौन से ही उत्पन्न हो पाते है। मानसिक शांति के लिए अच्छा समाधान मौन है। आवश्यक वाद-विवाद तथा तर्क मानसिक संतुलन बिगाड़ देता है। चुप रहे!शांत रहे! मौन रहे! आनंदित रहे!
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