माता-पिता बच्चों का अच्छा व्यक्तित्व का निर्माण कैसे करें?

माता-पिता, परिवार, विद्यालय व आस-पास के वातावरण का प्रभाव बच्चों पर बहुत तेजी से पड़ता है।
सैद्वान्तिक या व्यवहारिक रूप से माता-पिता के संबंध मधुर नहीं होने पर बच्चे कठोर हृदयी हो जाते है। जीवन के प्रति असाधारण नकारात्मक दृष्टिकोण वाली विचारधार पाल लेते हैं।
माँ-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को पालन-पोषण में धैर्य और चतुराई से काम लें।
प्रसन्नता और खुशी के साथ बच्चों को अच्छे कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
बच्चों को बार-बार फटकारने से वे दब्बू बन जाते है।
फुसलाने से बच्चों का स्नायु तंत्र निर्बल हो जाता है और कभी-कभी मूत्र वेग पर बच्चों का नियंत्रण भी खो जाता है।
माँ को कभी भी अपने बच्चों में सौतेलेपन का व्यवहार नहीं करना चाहिए। स्नेह और प्यार घर पर मिलने से बच्चा प्यार और स्नेह कहीं बाहर नहीं ढूंढ़ता।
बच्चे को कैसी भी विकट परिस्थिति में अकेला व असुरक्षित होने का अनुभव नहीं होने देना चाहिए।
बच्चों को कभी भी झूठे वादे, लोभ व लालच नहीं देना चाहिए बच्चों में जिद्व से बात मनवाने की आदत हो जाती है और ऐसे बच्चे आगे जाकर कभी भी आदर व श्रद्धा माता-पिता के प्रति नहीं रखते है।
बच्चों की छोटी-छोटी गलतियों इन्हे दण्डित नहीं क्षमा करना चाहिए क्योंकि छोटी-छोटी गलतियों से बड़े ही व्यवहारिक ढंग से बच्चे बहुत कुछ सीख जाते हैं।
बच्चे के पैदा होने के बाद ही दूध पीने, नहाने और सुलाने हेतु सुनिश्चित नियमितता बना लेनी चाहिए।
माँ अपने बच्चे को अपने बिल्कुल चिपका कर नहीं सुलाए बल्कि थोड़ा सा दूर सुलाना चाहिए।
बच्चे को साफ, शांत और बिल्कुल कम रोशनी वाले स्थान पर सुलाना चाहिए।
अधिक रोशनी से बच्चे को बचाना चाहिए।
बच्चा स्वयं खुशी-खुशी खेले और आनन्दित रहें ऐसे प्रयास किए जाने चाहिए।
हड्डियों के विकास, वृद्धि और मजबूती के लिए बच्चों की मालिश करके कुछ देर सुबह की हल्की धूप में कपड़े उतार कर सुरक्षित रूप से धूप का सेवन करवाना चाहिए।
बच्चों को शुरू से ही पौष्टिक खाना खाने और समुचित कपड़े पहनने की आदत डाल देनी चाहिए जिससे बच्चे आगे इस बारे में आनाकानी व परेशान नहीं करते।
बच्चा मुँह में बार-बार अपना अंगूठा या अंगुली डालता है जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है इसलिए अंगूठा व अंगुली मुँह से बाहर निकाल देना चाहिए और हाथों कोई खिलौना या अन्य लुभावनी वस्तु बच्चे को पकड़ा देना चाहिए। या
बच्चों को पहनाने वाले कपड़ों की आस्तीन बड़ी बनवानी चाहिए। या
अंगूठे व अंगुली पर नीम के पत्तों का पानी लगा देना चाहिए।
बच्चा बार-बार अपना सिर धुने या हिलाएं या दांत से नाखून कुतरने लगे तब इन आदतों से चौकन्ना रहकर बुरी आदतें दूर रखने के प्रयास करना चाहिए। बच्चे के जननांगों व गुदामार्ग को साफ रखना चाहिए।
अनुशासन में रखने की आदत बचपन से ही डाल देनी चाहिए। बच्चे के रोने के कारणों को जानना व पहचानना चाहिए। गोदी के लालच में बार-बार रोएं तो तुरंत गोदी में नहीं लेना चाहिए।
माता-पिता का कर्तव्य है कि अनुशासित रहकर बच्चों में अच्छे अनुशासन के बीज बोएं और बच्चों को हाँ हाँ और नहीं नहीं है अच्छी तरह समझा देना चाहिए।
बच्चे को छोटे-छोटे अपने काम करना धीरे-धीरे सिखाना चाहिए। जैसे खिलोनें या अन्य वस्तुएं टोकरी में वापस डालना, स्वयं के हाथों से खाना खाने की आदतों को प्रोत्साहित करना।
जल्दी-जल्दी भोजन ठूंसने से बच्चों को रोकना चाहिए और निश्चित समय में भोजन खत्म करने हेतु प्रेरित किया जाना चाहिए।
बच्चों से सदा सकारात्मक बातें करनी चाहिए। नकारात्मक स्थितियां बच्चों के सामने उत्पन्न नहीं करनी चाहिए। बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा खिलौने, चित्र या कहानी के माध्यम से मनोरंजक होने के साथ ही सकारात्मक प्रेरणा देने वाली भी होनी चाहिए।
बार-बार नई चीजें या खिलोने बच्चों को लाकर नहीं देने चाहिए ऐसी प्रवृत्ति से बच्चों में जो उनके पास है उसके प्रति नकारात्मकता, असंतोष एवं लापरवाही भरी भावना प्रकट होने लगती है।
खेल में व्यस्त रखने के लिए जोड़-तोड़ वाले खिलौने देने चाहिए जिससे बच्चे नए-नए आकार बना सकें और बौद्धिकता में अच्छी वृद्धि हो सकें। मस्तिष्क के अच्छे विकास के लिए चित्रकला, ड्राईंग व दिमागी खेल खेलने को प्रेरित करना चाहिए।
बच्चों को स्वयं का रूमाल, तौलिया, कपड़े, नेकर, पाजामा, साबुन, कंघा और अन्य सामान अलग स्थान पर रखे जाने चाहिए और प्रयास करना चाहिए कि धीरे-धीरे बच्चा प्रयास करें कि वह खुद अपना सामान सही स्थान पर रखने लगे।
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