हृदय मुद्रा अर्थात् अपानवायु मुद्रा
अंगुठे के पास वाली अंगुली (तर्जनी) को मोड़कर अंगूठे की जड़ पर लगाएं मध्यमा तथा अनामिका की अंगुलियों के पारों को अंगूठे के पोर से मिलाएं कनिष्ठा अंगुली सरलता से सीधी रहे। यह मुद्रा दिल का दौरा रोकने का अचूक उपाय है इसका नियमित अभ्यास हृदय रोग तथा उच्च रक्तचाप दूर कर देता है।

इस मुद्रा के प्रभाव तुरंत दृष्टिगोचर होते हैं। मौत के चंगुल से बचा लेती है यह मुद्रा। अचानक दिल का दौरा पड़ते हुए प्रतीत हो तो तुरंत अपानवायु मुद्रा करें अथवा करावें। हृदय घात से बचा जा सकता है। हार्ट अटैक रोकने में यह मुद्रा इंजेक्शन के समान प्रभाव डालती है। जब तक डॉक्टर आएगा या डॉक्टर के पास जाएंगे इस मुद्रा के प्रभाव से हृदय की ओर चढ़ता और दिल संबंधी नाड़ियों पर पड़ता दबाव कम हो जाता है जिससे हृदय घात के कारण मौत से बचा रहा जा सकता है। इसके अतिरिक्त यह मुद्रा गैस, वात आदि की नाशक है। इस मुद्रा का प्रयोग दिन में बहुत बार किया जा सकता है।
वायु मुद्रा से जो दर्द ठीक नहीं होते इस मुद्रा से ठीक हो जाते है। अधिकतम हृदय घात गैस के ऊपर की ओर बढ़ने व पाचन तंत्र की गड़बड़ी से ही होते है इसलिए व्यक्ति को सात्विक आहार की ओर अधिक प्रयत्नशील रहना चाहिए। हृदय घात संकट के समय पर दवा और उपचार मिलने अथवा उपलब्ध होने से पूर्व ही यह मुद्रा अपना प्रभाव दिखा देती है।सिर-दर्द, हृदय की कमजोरी, अनिद्रा, चिंता, परिश्रम, रक्त संचरण की अनियमितता इस मुद्रा से स्वतः ठीक हो जाते है। सिढ़िया चढ़ने व यात्रा शुरू करने से पहले 5-10 मिनट इस मुद्रा को करने से हाँफने की समस्या दूर हो जाती है।
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