उत्सर्जन तंत्र के रोगों का कारण और हानियां क्या है?
उत्सर्जन तंत्र का एक महत्त्वपूर्ण अंग होते है शरीर के गुर्दे।
गुर्दे शरीर में रक्तचाप का नियंत्रण, लाल रक्त कोशिकाओं, इलेक्ट्रोलाईट व विटामीन डी व लाल रक्तकोशिकाओं के निर्माण के साथ रासायनिक पदार्थों के संतुलन में सहायक होते है।
अम्ल-क्षार के संतुलन के साथ ही साथ हार्मोन्स स्रावित करते है।
जल और विष अर्थात् दूषित पदार्थों को खून से अलग करने का महत्त्वपूर्ण कार्य करते है।
शरीर से अतिरिक्त पानी व नमक नहीं निकल पाने के कारण किडनी संबंधी रोग पनप सकते है।
गुर्दों का संबंध हृदय, फेफड़ों, यकृत व तिल्ली से होता है। रक्त को साफ कर मूत्र बनाने का कार्य गुर्दे ही करते है।
दूषित जल व खाद्य पदार्थ का प्रयोग, गुर्दे शरीर का विष मूत्र द्वारा बाहर निकालते है जब वे ऐसा नहीं कर पाते है तो गुर्दा संबंधी रोग उत्पन्न होने लगते है। नेफ्राल के टूटने से शरीर से व्यर्थ पदार्थों को बाहर
निकालने में गुर्दे असक्षम हो जाते है। मधुमेह, पथरी, उच्च रक्तचाप, कीटाणुनाशक, रासायनिक खाद्य व नमक का अधिक प्रयोग गुर्दों पर बुरा असर डालते है।
चटपटी चीजों के लिए गुर्दों को बहुत कीमत चुकानी पड़ती है।
हानियां-
मूत्र संबंधी तकलीफ यथा मूत्र व मल त्याग में परेशानी, पेशाब में खून, आँखों के नीचे सूजन, पैरों के पंजों में सूजन तथा पाचन तंत्र आदि कमजोर होने की संभावना रहती है।
शरीर में विष के कारण हाथ, पैर, टखना व चेहरा सूज जाता है जिससे अत्यधिक थकान, कमजोरी, चक्कर आना, ध्यान केन्द्रित करने में असमर्थता, हर समय ठण्ड का आभास होना, त्वचा पर चकते और खुजली, मुँह से बू, मतली, उल्टी, श्वास में तकलीफ, पीठ व कमर दर्द आदि की समस्याएं व रोग प्रकट होने लगते है।
सुबह सोकर उठने पर भी आलस्य, सुस्ती, आँखों के नीचे पलकें फुलना, थकान व ष्श्वास की तकलीफ बनी रहना, भूख में कमी, चक्कर, वजन घटना, मितली, उबकाई व उल्टियाँ, उच्च रक्तचाप, वेदना, दर्द, बुखार, खून में कमी, पाण्डु, मंदाग्नि, पसीने में कमी, त्वचा का रूखापन, नाड़ी गति का तीव्र होना, पीड़ा के साथ गर्म पेशाब आना, पेशाब में जलन, हाथ-पैर ठण्डा, बूंद-बूंद पेशाब, अनिद्रा, यकृत व तिल्ली में दर्द, आँखों में विकृति, खूब प्यास लगना, निरन्तर कब्जी रहना आदि होने की संभावना रहती है।
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