दीर्घश्वास प्रेक्षा प्रयोग प्रविधि | Benifits of Deep Breathing Preksha Method

दीर्घश्वास प्रेक्षा प्रयोग प्रविधि

श्वास ही जीवन है। ईश्वर ने खिलौने रूपी शरीर में सांसों की चाबी गिनती की ही दी है, इसे किस प्रकार खर्च करना चाहिए, यह हमें सीखना चाहिए। सांसों की सोच-समझ व संभल कर हिफाजत करनी चाहिए और सतर्क रहते हुए इसके अनावश्यक व्यय से भी बचना चाहिए। सही व संतुलित तरीके से की गई श्वास की सही बचत ही स्वस्थ व दीर्घ जीवन प्रदान कर सकती है। दीर्घश्वास उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, तनाव, क्रोध, अवसाद, श्वसन तंत्र जनित अनेक बीमारियों की रोकथाम में महत्त्वपूर्ण  भूमिका निभाता है।

दीर्घ-श्वास प्रेक्षा प्रयोग विधि अर्थात् श्वासोच्छाव की दीर्घ प्रक्रिया। यह अभ्यास कभी भी तथा कहीं भी (प्रदूषित वातावरण को छोड़कर) किया जा सकता है। श्वास की गति को मंद करें। धीरे-धीरे लम्बा गहरा श्वास लें। सामर्थ्य व क्षमता अनुसार श्वास भीतर रोकें (भीतरी कुंभक)। धीरे-धीरे लम्बा गहरा श्वास छोड़ें। सामर्थ्य व क्षमता अनुसार श्वास बाहर रोकें (बाहरी कुंभक),श्वास लयबद्ध और समताल करें। हृदय तथा उच्च रक्तचाप रोगी कुंभक का प्रयोग न करें। पहली बार श्वास को छोड़ने और लेने में जितना समय लगे, प्रत्येक आवृत्ति में उतना ही समय लगे।  श्वास के कम्पन नाभि तक पहुँचें। श्वास लेते समय पेट की मांसपेशियाँ फूलती हैं एवं छोड़ते समय सिकुड़ती हैं। चित्त को नाभि पर केन्द्रित करें और पेट की मांसपेशियों के फूलने और सिकुड़ने का अनुभव करें तथा उसके द्वारा आते-जाते श्वास का अनुभव करें। प्रत्येक श्वास की जानकारी बनी रहें। श्वास को सुनने का अभ्यास करें।

गहरी एकाग्रता और पूरी जागरूकता के साथ दीर्घश्वास प्रेक्षा का अभ्यास करें। अभ्यास की निरन्तरता बनाए रखें। कुछ समय तक इस अभ्यास को जारी रखें। चित्त को नाभि से हटाकर दोनों नथुनों के भीतर संधि स्थल पर केन्द्रित करें। क्रम बद्ध व लयबद्ध लम्बा श्वास चालू रखें और आते-जाते प्रत्येक श्वास का अनुभव करते हुए श्वास को सुने।

समताल व लयबद्ध लम्बा श्वास चालू रहें। प्रत्येक श्वास को जानते हुए लें और जानते हुए छोड़े। चित्त की सारी शक्ति श्वास को देखने व सुनने में लगा दें। केवल श्वास का श्रवणकरें…लयबद्ध, लम्बा श्वास चालू रहें।

यदि विकल्प आते हैं तो उन्हें रोकने का प्रयत्न न करें। केवल द्रष्टाभाव से देखें और बीच-बीच में श्वास-संयम का प्रयोग करें या जीभ को उलट कर तालू से लगा दें। श्वास के प्रति जागरूक रहें। केवल श्वास का श्रवण व अनुभव हो। दिन में बीच-बीच में कई बार लम्बे गहरे श्वास लेने का अभ्यास करने पर दीर्घश्वास प्रक्रिया स्वतः नियमित हो जाती है।

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