महिलाएं अपना मेटाबॉलिज्म समझें और समय व शक्ति का बजट बनाएं
मेटाबॉलिज्म शरीर के कोशों में निरन्तर होने वाला बायोकेमिकल बदलाव है। इस परिवर्तन में अन्तर पाया जाता है जिसके चलते कुछ महिलाएं सुबह 5 बजे ही स्फूर्ति के साथ काम में लग जाती है तो कुछ महिलाएं सुबह उठकर आधा समय को उंधने में ही बीता देती है।

कई महिलाएं थोड़ा सा काम करती है और थकान महसूस करने लगती है और कई महिलाएं दिन भर खुशी-खुशी चेहरे पर हँसी के साथ सारा काम निपटा देती है। यह सब मेटाबॉलिज्म पर निर्भर करता है।
कई महिलाएं बाजार में घूम-फिर कर सामान खरीद लाती है और भिन्न-भिन्न तरह का खाना रसोई में बनाने में रूचि रखती है लेकिन अन्य कामों में रूचि लेने में काम करने से पहले ही खुद को थका महसूस करने लगती है और काम होने पर पूरी तरह पस्त हो जाती है।
महिलाओं को चाहिए कि वे अपने मेटाबॉलिज्म को पकड़ कर रखें और उसे समझ कर ही अपनी दैनिक चर्या निर्धारित करें।
महिलाओं को चाहिए कि वे खुद के क्रिया-कलाप की जाँच करें कि कब और कितने समय तक उनमें स्फूर्ति व क्षमता बनी रहती है।
महिलाओं को चाहिए कि इन्हें यह अच्छी तरह से जान व समझ लेना चाहिए कि कब उन्हें काम करना चाहिए और कब काम करना बंद कर देना चाहिए और विश्राम कर लेना चाहिए।
महिलाओं को चाहिए कि वे जरूरी कामों में रूचि लेना सीखें। याद रखें जिस काम को करना ही नहीं चाहते हैं उस काम को करने में अधिक थकान होती है।
अपना मेटाबॉलिज्म दुरूस्त बनाएं रखने के लिए दिनभर के कार्यों की कार्य योजना बना लेनी चाहिए।
हर महिला की शारीरिक व मानसिक थकान भिन्न-भिन्न होती है और ऊर्जा का प्रयोग भी भिन्न-भिन्न स्तर पर होता है। शारीरिक के साथ मानसिक थकान से बचने का पूरा अभ्यास करें। इसके लिए खुद को ही खुद से प्रशिक्षित होना पड़ेगा। कोई और कुछ भी मदद नहीं कर पाएगा।
मेटाबॉलिज्म माता-पिता व दादा-दादी से प्राप्त होती है। इनकी आदतों को समझना भी आवश्यक है।
दिन भर के कार्य यदि सुनियोजित ढंग से किए जाए तो महिलाओं को कुछ अपवादों को छोड़कर थकान का अनुभव नहीं होना चाहिए।
काम व परिवार के साथ पारस्परिक तालमेल के साथ अपने स्वास्थ्य व विश्राम के प्रति सजग रहें।
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