पढ़ने वाले बच्चे कैसे-कैसे होते है?
किताबी कीड़े वाले-
किताबों में ही सिर घुसाए रहने वाले बच्चें 90-95 प्रतिशत अंक प्राप्त होने पर भी रूआसें होकर बड़ी उदासी से कहते हैं-पता नहीं अच्छे नम्बर क्यों नहीं आए। बहुत सोच-सोच विचार करते रहते हैं और खुद को दुःखी और तनावग्रस्त कर लेते हैं कि शायद वह प्रश्न ठीक नहीं था या उसका उत्तर ठीक नहीं दे पाया या टीचर ने कॉपियां अच्छे से नहीं जांची इसीलिए 99.99 या 100 प्रतिशत अंक मेरे नहीं आ पाए। ऐसे बच्चे अधिक से अधिक ज्ञान लेने का प्रयास करते हैं।
रट्टामार बच्चे-
विषय पर बिना ज्ञान साधे और समझे ऐसे बच्चे प्रश्नों के उत्तर रट-रट कर केवल पास हो जाने भर में यकीन रखते है। ऐसे बच्चों को विषय पर कभी भी पकड़ नहीं होती और ना ही वे किसी को अपने विषय के बारे में पूरी तरह समझा पाने में सक्षम होते हैं। कॉमन सेन्स का प्रयोग नहीं के बराबर कर पाते हैं और एग्जाम में तो रट रटा कर पास हो जाते है किंतु आगे नौकरी या अन्य सेवाओं के लिए इंटरव्यू व संप्रेषण आदि में बहुत नर्वस हो जाते हैं जिससे बेरोजगारी का सामना अधिक करना पड़ता है और जीवन में सफल नहीं हो पाते हैं।

मौज मस्ती वाले बच्चे-
क्या है? पास ही तो होना है। वैसे भी क्या रखा है पढ़ाई में! माँ-बाप पीछे पड़ जाते हैं इसलिए आ जाते हैं भाई किताबों में टाईम पास करने! ऐसे बच्चे पढ़ाई में नहीं केवल घूमने-फिरने, मौज-मस्ती करने और तफरी मारने के लिए स्कूल-कॉलेज में आते हैं। कक्षा से भाग कर कैंटीन में बैठ जाना, पेड़ की छांव के नीचे बैठकर गप्प और ठहाके मारना या स्कूल से गायब होकर बाजार में टहलने या फिल्म देखने निकल जाते हैं। ऐसे बच्चे पढ़ाई में रूचि कम लेते हैं किंतु दिमाग के तेज होते हैं क्योंकि ऐसे बच्चे थोड़ा सा पढ़कर भी मध्यम श्रेणी तक पास हो ही जाते हैं।
फैशन की चलती-फिरती दुकान-
लड़के हो या लड़कियां कुछ तो फैशन की हौड़ में खुद को दिखाने के लिए ही नियमित स्कूल आते हैं। अपने पहनावे और फैशनी अंदाज से सबको अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करते हैं। विषयों के प्रश्नों के उत्तर के बजाए नवीनतम फैशन से संबंधित जानकारी बांटने में सबसे आगे रहते है। ऐसे लड़के व लड़कियां अपने चाहने वालों से हमेशा घिरे रहना पसंद करते हैं और पढ़ाई में मध्यम श्रेणी के फिसड्डी होते हैं।
डिग्री के भूखे बच्चे-
साम-दाम-दण्ड कैसे भी डिग्री मिल जानी चाहिए। इसके पीछे घरेलू व अन्य कारण हो सकते हैं। पार्ट टाईम जॉब करने वाले बच्चे नियमित कॉलेज नहीं जा पाने के कारण कई बच्चे तो प्राक्सी अटेंडेंस पर निर्भर रहते हैं। इधर-उधर दोस्तों से नोट्स मांगते फिरते है। इम्पोरटेंट प्रश्नों के लिए मोटी रकम तक खर्च कर देते हैं। किताबें उठा कर कभी नहीं देखते और परीक्षा का टाईम-टेबुल और दिनांक आते ही पास बुक या पिछले पांच सालों के सोल्वड पेपर पर टूट पड़ते है। इनमें से भी 10-15 प्रश्नों के उत्तर रटने की स्थिति रखते है और परीक्षा प्रश्नों के उत्तर कयास लगाकर और तुक्के से देकर आने में अच्छा समझते हैं और पास भी हो जाते हैं।
कमजोर बच्चे-
ऐसे बच्चे बच्चे जिन्हें विषय संबंधी पढ़ाई अच्छी तरह से समझना ही नहीं चाहते और ना ही एकाग्रता व जागरूक रहकर शिक्षक से शिक्षा लेने में रूचि रखते हैं। ऐसे बच्चे लापरवाही के कारण पढ़ाई में कमजोर रह जाते हैं और दोस्तों तथा होशियार बच्चों के आगे-पीछे घूमते और ग्रुप डिस्कसन करते नज़र आते हैं।
मवाली टाईप बच्चे-
ना खुद पढ़ना और ना दूसरों को पढ़ने देना। गुरूओं और शिक्षकों का सम्मान तो दूर-दूर तक भी नहीं करने वाले ऐसे बच्चे स्कूल और कॉलेज में मार-पिटाई व लड़ाई-झगड़ा करके केवल दहशत और उत्पात मचाने का काम करते हैं। अपनी औंछी हरकतों से बदनाम भी रहते हैं। अच्छी शारीरिक कद-काठी और बल का दुरूपयोग करते हैं। छोटे व कमजोर बच्चे इनको देखते ही सहम जाते हैं। पैसे खोंसना, धमकाना, लंच बॉक्स का खाना छिनना आदि राजनैतिक और अवैधानिक गतिविधियों में दादागिरी से लिप्त रहते हैं।
भविष्य की कोई चिंता नहीं होती है कॉलेज या यूनिवर्सिटी में एक विषय से परीक्षा पास करके फिर दूसरे विषय की पढ़ाई के लिए प्रवेश ले लेते हैं और कॉलेज व यूनिवर्सिटी में अनैतिक गतिविधियों से आतंक मचाए रखते हैं। दादागिरी और आवारागर्दी के चलते परीक्षा के समय झूठा मेडीकल प्रमाण देकर परीक्षा में भी गोत मार जाते हैं।
फर्रे वाले बच्चे-
पूरे साल किताबों को अपनी शक्ल तक नहीं दिखाते और परीक्षा का टाईम-टेबिल व दिनांक मिल जाने के बाद भी पढ़ाई में रूचि के प्रति सक्रियता कहीं नहीं दिखाई देती किंतु परीक्षा के एक दिन पहले इनके परीक्षा के नाम से पसीने छूटने लगते है और एक दिन पहले ही पूरे 24 घंटे तन-मन से तरह-तरह के फर्रे बनाने या नकल करने के साधन जुटाने में लगा देते हैं। ऐसे बच्चे वास्तविकता यह है कि शिक्षक से नहीं खुद से चोरी करते है।
औसत दर्जे वाले बच्चे-
साल भर पढ़ाई के लिए किताबें सामने रखते है किंतु मन बार-बार इधर-उधर विचलित होता रहता है जिससे टीचर द्वारा पढ़ाया गया पाठ सिर के ऊपर से गुजर जाता है फिर बार-बार शिकायत करते हैं कि पढ़ते तो है किंतु याद नहीं होता। इसके लिए अलग से कोचिंग और ट्यूशन भी लेने है किंतु वहाँ भी स्थिति में अधिक सुधार नहीं आ पाता है। ऐसे बच्चे विषय पर आधी-अधूरी ही सही लेकिन ज्ञान लेने की मशक्कत आधी मंशा के साथ करते है जिससे उनका परिणाम औसत दर्जे का रह जाता है।
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