त्राटक-त्राटक का अभ्यास शांत, स्वच्छ तथा प्रदूषण रहित स्थान पर किया जाए। दैनिक रूप से एक निश्चित समय पर किया जाना अधिक लाभप्रद है। रोज 10 मिनट जरूर करे। विद्यार्थियों के लिए बहुत लाभदायक है। याददाश्त, बौद्धिक क्षमता, एकाग्रता व मानसिक विक्षिप्तता को दूर करता है। दैनिक जीवन में अतुलनीय अभ्यास है।
त्राटक के अभ्यास से मन की शक्ति को एक केन्द्र पर स्थापित करने से चेतना का विकास होता है। मन का भटकाव, अनिद्रा रोग व स्नायविक तनाव दूर होता है।प्रातःकाल तथा सांयकाल किया जा सकता है। आँखें थक जाए या पानी निकलने लगे तब अभ्यास रोकंे और ठण्डे पानी से आँखें धो लें। एकाग्रता के विकास से ही ध्यान सफल हो पाता है। त्राटक ध्यान का सरल व प्रभावशाली साधन है।

एक ही बिन्दु या वस्तु को एकाग्रचित होकर बिना पलक झपकाएं देखने को त्राटक कहा जाता है अर्थात् स्थिर दृष्टि या किसी दृश्य या बिन्दु को अपलक निहारना त्राटक है। त्राटक का अभ्यास बाहरी तथा आंतरिक दोनों बिन्दुओं पर किया जा सकता है। बाहरी बिन्दु पर किया गया त्राटक बाहृय त्राटक तथा आन्तरिक बिन्दु पर त्राटक को अन्तःत्राटक कहा जाता है। त्राटक के प्रयोग से चंचलता समाप्त होकर मानसिक शांति व एकाग्रता विकसित होती है।
सभी धर्मों में पूजा, अर्चना, प्रतीकों, चित्रों, मूर्तियों के रूप में त्राटक का अभ्यास किया जाता है। बहिर्मुखी व्यक्तित्व के लिए बाहरी त्राटक का अभ्यास लाभदायक है इसके निरन्तर अभ्यास से व्यक्ति अन्तःत्राटक के समय उस वस्तु का प्रतीक की स्पष्ट रूप से मानसिक कल्पना करने में सक्षम हो जाता है। अन्तःत्राटक के अभ्यास द्वारा मन की गहराईयों की प्रेक्षा की जा सकती है। मन को बांधने की क्षमताएं जागृत की जा सकती है।
त्राटक के अभ्यास के लिए कोई बिन्दु अथवा प्रतीक होना आवश्यक है। किसी बिन्दु या प्रतीक का चयन कर लेने पर उसे बदले नहीं। मोमबत्ती की लौ, आसमान में स्थित तारा, पेड़, पौधे या कोई वस्तु आदि पर त्राटक का अभ्यास किया जा सकता है।
त्राटक का अभ्यास चश्मा, लेंस आदि पहन कर न करें। मानसिक रोगों से ग्रस्त, नशा करने वाले, जटिल बुखार, गालब्लेडर, मिर्गी वाले व्यक्ति त्राटक अभ्यास न करें। त्राटक के समय श्वास की गति लयबद्ध एवं समताल रहे।
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