योग के विविध रूप और मन तथा शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव
छाती फैलाने वाले आसन-मूड व स्वभाव को बेहतर बनाते हैं तथा मानसिक शक्ति बढ़ती है।
संतुलन बनाने वाले आसन-अनुमस्तिष्क की क्रियाशीलता को स्थाई बनाता है जिसका प्रभाव हमारी अभिव्यक्ति पर पड़ता है।
आगे झुकने वाले आसन-तनाव से मुक्ति दिलाते हैं।
शरीर को ट्वीस्ट करने वाले आसन-शरीर के विजातीय द्रव्य अथवा दूषित पदार्थ अथवा गंदगी बाहर निकालते हैं।

पेट के बल किए जाने वाले आसन-पाचन तंत्र को पुष्ट व मजबूती प्रदान करते हैं।
नकारात्मक भावनाएं तथा व्यवहार की निरंतर गतिशीलता से लसीका ग्रंथियों में विषैले पदार्थों का जमाव हो जाता है जिन्हें यौगिक क्रियाओं द्वारा आसानी से शरीर से बाहर किया जा सकता है। मांसपेशियों की अकड़न दूर होती है।
भिन्न-भिन्न किए जाने वाले योगासन-मेरूदण्ड की हड्डी पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं जिससे नर्वस सिस्टम की बेहतर क्रियाशीलता बनी रहती है।
सूर्य नमस्कार-मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करने वाली सभी एंडोक्राईन ग्रंथियों पर अनुकूल प्रभाव डालकर भावनात्मक उतार-चढ़ाव को भी नियंत्रित करता है।
तेज गति के आसन-सुस्ती व थकान बहुत जल्दी मिटाते हैं।
श्वास क्रिया के साथ आसन-नर्वस सिस्टम की हाइपरएक्टिव एनर्जी को संतुलित स्तर तक लाने का काम करते हैं।
अच्छे स्वास्थ्य के लिए नियमित रूप से योग करना चाहिए। सर से पैर तक सूक्ष्म योगिक क्रियायें रोज करनी ही चाहियें। मस्तिष्क के लिए मस्तिष्क की योगिक क्रियाएँ और आँखों, कान, नाक, मुँह, गर्दन, कंधे, छाती, पेट, कमर, मेरुदंड, हाथो और पैरों की योगिक क्रियाएँ जरूर करनी चाहियें।
योग करने से पहले पर्याप्त पानी पीना चाहियें, योग भूखे पेट किया जाना चाहियें। खाना खाने के तीन – चार घंटे बाद किया जा सकता हैं। योग चिकित्सक के निर्देश में ही किया जाना चाहियें।
जटिल बिमारिओं की स्थिति में देखा-देखी से दूर रहे और क्षमता और सामर्थ्य के अनुसार ही योग करना चाहियें।
योग शरीर और मन में नई ऊर्जा और स्फूर्ति भरता हैं।
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