आपके सपने बच्चों को कहीं डस नहीं लें-
शिशु के पैदा होते ही उच्च कोटि का साबुन, उच्च कोटि के कपड़े, उच्च कोटि के शैम्पू व पाउडर खरीदते है और आगे भी अच्छी से अच्छी उच्च कोटि का जीवन-स्तर देने का प्रयास करते है किंतु इसी प्रयास में जिंदगी के वास्तविक और व्यवहारिक सिद्धान्तों और पहलुओं से दूर हो जाते है।

चूंकि जिंदगी ने बच्चों के लिए कुछ और सोचा होता है। दिन है तो रात भी है, अंधेरा है तो उजाला भी है और फूल है तो कांटें भी है। यही जिंदगी का मसौदा है।
राह में बच्चे गिरते भी है, संभलते भी है, इनका दिल भी टूटता है यह नहीं भूलना चाहिए। ठोकर खाकर खुद ही उन्हें उठना सीखने के लिए बच्चों को खुला छोड़ देना चाहिए ना कि बांधकर पकड़े रहना चाहिए।
बच्चों को उन्हें अपनी दुनिया बनाने की स्वतंत्रता देनी चाहिए। माता-पिता को अपने खुद के सपनों को पूरा करने के लिए बच्चों पर अपने विचार नहीं थोपना चाहिए।

माता-पिता की उम्मीदों को पूरा करने के लिए बच्चे जी जान से जुट जाएं इसके लिए बच्चों पर दबाव नहीं बनाना चाहिए।
बच्चों का अल्हडपन और मैदान व मिट्टी के खेल अब बीते दिनों की बातें लगती है। बंद कमरों में माता-पिता बच्चों की ओवर शिडयूल जीवन शैली तय कर देते है और कभी कभी तो उनकी नींद के समय में भी कटौती कर देते है।
दिन रात की मेहनत के बीच कुछ ही बच्चे परीक्षाओं में पास होते है और लक्ष्य तक पहुँच पाते हैं और कई बच्चे अन्ततः अवसाद के शिकार हो जाते हैं। कभी-कभी तक अवसाद का स्तर आत्महत्या तक पहुँच जाता है।

ओवर प्रोटेक्शन से बच्चे दब्बू, डरपोक व कमजोर बन जाते हैं। माता-पिता की छत्र छाया से ज्योंही बच्चे बाहर निकलते है स्वयं अपने वजूद को बरकरार नहीं रख पाते और ष्शोषण व मानसिक अवसाद का अधिक शिकार होते हैं।
असफल बच्चों को ताने व उलाहने ही हिस्से आते है और माता-पिता अपने असफल बच्चों की जिंदगी में कहाँ झांक पाते हैं।
लाखों का वेतन और लाखों के डॉलर के पैकेज के चक्कर में माता-पिता बच्चों के साथ अनजाने ही अप्रत्यक्ष रूप से अत्याचार करते हैं।
बेहतर परवरिश और बच्चों की अति सुरक्षा के बीच बनी सीमा रेखा को समझना बहुत आवश्यक है।

ऐसा नहीं है कि प्रतिस्पर्धा के इस युग में बच्चों को अकेला व असहाय छोड़ दें। आपके सपने बच्चों को कहीं डस नहीं लें। बच्चों के साथ खड़े जरूर रहें लेकिन उन्हें अपनी समस्याओं से खुद उबरने दें।
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