श्रम और विश्राम के संतुलन में आहार चयन करें। पृथ्वी तत्त्व वाले पदार्थ: श्रम और विश्राम है।
सुबह जागने के बाद शरीर अपने आप ही शरीर की सफाई का कार्य शुरू कर देता है। स्वतः ही मल-मूत्र त्यागने की अनुभूति होती है। प्रकृति खुद ही शरीर के अंदर और बाहर उचित सफाई क्रिया प्रारम्भ करने में लग जाती है और इसके लिए हमें प्रेरित भी करती है।

जब शरीर में सफाई का काम चल रहा हो तो उस समय कुछ भी खाने का प्रयास बेवकूफी व मूर्खता है क्योंकि यह स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे कि झाड़ू लगाने वाले व्यक्ति से झाड़ू लगाने का काम अधूरा छुड़वाकर किसी दूसरे काम में लगा दिया जाए।
ध्यान रहें शरीर की सफाई का काम लगभग 12 बजे तक चलता रहता है। इस समय पृथ्वी तत्त्व वाले पदार्थ तुलसी, बेल की पत्ती, नीबू पानी या शहद पानी लिया जाना स्वास्थ्य के लिए हितकर है। कुछ स्थिति में नारंगी या मौसमी का रस भी थोड़ा पानी मिलाकर लिया जा सकता है। दस-पन्द्रह किशमिश या मुनक्का रात भर पानी में भिगोकर रखें और सुबह मसल कर पानी सहित खाना चाहिए। यह प्रातः भोजन अच्छा है। किसी भी प्रकार का अन्य भोजन 12 बजे से पहले नहीं करके 12 बजे के बाद किया जाना बहुत अच्छे स्वास्थ्य का माध्यम है।

जो लोग दिन में विश्राम कर सकते हैं इन्हें 12 बजे बाद अन्न वाला भोजन का सेवन करके कम से कम एक घंटा विश्राम करके अन्य दैनिक कार्य प्रारम्भ करने चाहिए।

दुकान, नौकरी या कार्यालय में कार्य करने वाले पुरूष एवं महिलाएं जिन्हें दिन में विश्राम करने की सुविधा प्राप्त नहीं हो सकती है। ऐसे लोगों को काम की समाप्ति के बाद शाम को ही अन्नवाला आहार किया जाना चाहिए। इन्हें दिन में मौसमी फल या सलाद आदि सब्जी का सेवन करना चाहिए।
शाम को भोजन के बाद एक घंटा विश्राम जरूर करना चाहिए। थोड़ा टहल कर समय पर सो जाना चाहिए।

यदि श्रम के बाद भोजन और भोजन के बाद कुछ समय आराम अथवा विश्राम का क्रम अपना लिया जाए तो पाचन क्रिया दुरूस्त रह कर सही ढंग से कार्य करती है जिससे मल-मूत्र विसर्जन भी संतोषजनक ढंग से होने लगता है।
ख्याल रखें मल-मूत्र विसर्जन के बाद ही शरीर में स्फूर्ति व क्रियाशीलता बढ़ती है। जब मल विसर्जन के बाद भी जब शरीर में भारीपन महसूस हो तब यह समझना चाहिए कि आंतों में अभी काफी मल भरा पड़ा है।
अनावश्यक मल संचय नहीं करें। यह रोगों का घर है। मल बाहर निकलते ही रोग स्वतः जाने लगते हैं। मल की अधिकता दीर्घ अवधि तक बने रहने से आंतों की मल निकालने की क्षमता नष्ट हो जाती है। इसलिए औषद्यियां ही औषद्यियां शरीर के भीतर नहीं डालें बल्कि मल को शरीर से बाहर निकालें।

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