स्वच्छ वायु व खुले आकाश में संपर्क के फायदे
ताजी हवा ऊर्जात्मक तथा सकारात्मक प्रभाव डालती है।
हम मुँह से भोजन करते है जैसा भोजन भोजन पेट में डालते है वैसा ही स्वास्थ्य मिलता है। इसका मतलब साफ है कि हम नाक से जैसी वायु ग्रहण करते है वैसी ही वायु का प्रभाव शरीर व मन पर पड़ता है और रोग भी उसी अनुसार प्रकट होता है।

हम जितनी बार श्वास लेते है उतनी ही बार शरीर के भीतर स्थित रक्त भी श्वास के साथ वायु के सम्पर्क में आता है। ऑक्सीजन ग्रहण करने के साथ ही साथ रक्त अच्छे या दूषित पदार्थों को भी ग्रहण कर लेता है। मतलब है कि जैसी वायु ग्रहण करेंगे रक्त भी उसी प्रकार के तत्त्व ग्रहण कर लेता है।
शरीर में गर्मी अनवरत उत्पन्न होती है। शरीर की गर्मी का संतुलन बनाए रखने के लिए शरीर से हमेशा गर्मी निकालने के प्रयत्न किए जाने चाहिए।
स्वच्छ, निर्मल, ठंडी व चलायमान वायु जब शरीर को छूती है तब वह भी गर्म हो जाती है मतलब की ठण्डी हवा शरीर से गर्मी लेकर चली जाती है। हवा जितनी शीतल व शुष्क होती है इसमें जलीय अंश भी कम होते हैं।
घर के भीतर भी विशुद्ध शीतल, शुष्क व चलायमान हवा का प्रवाहन होते रहने की व्यवस्था होनी चाहिए।
शुद्ध हवा से त्वचा की नई संवेदना प्रकट होती है और उद्वीप्त होती है जिससे शरीर की कोशिकाओं का निर्माण द्रुत गति से होता है। नींद अच्छी आती है और स्नायविक तंतु स्वस्थ होते है।
जो व्यक्ति आकाश व खुली हवा में अधिक रहते है इन्हें सर्दी व संक्रमण नहीं सताता है।
त्वचा की कांति व भूख बढ़ाने का अद्भुत उपचार है शुद्ध हवा का सेवन किया जाए। शुद्ध वायु के सम्पर्क में विचार शक्ति बढ़ती है।
स्वच्छ वायु के सेवन से थॉयराईड व एड्रीनल ग्रंथियों के अच्छे स्राव होते हैं। दीर्घ आयु होती है और बुढ़ापा देरी से आता है।
शरीर की त्वचा पर शुद्ध हवा के प्रभाव से ही सर्वोत्त्म लाभ होता है।
वायु स्नान लेते समय कम से कम कपड़े शरीर पर रहें तभी लाभ मिलता है।
वायु स्नान लेने से पहले यह जाँच ले कि वायु गतिशील, शुष्क, जल रहित और शरीर की अपेक्षा शीतल हो।
ज्ब शरीर ठण्डा हो तब वायु स्नान नहीं लेना चाहिए बल्कि शरीर गर्म हो तभी वायु स्नान लेना चाहिए जिससे शरीर का ताप संतुलन बना रहें।
वायु स्नान लेते समय ठण्ड लगने लगे तब तुरंत शरीर को गर्म करने के प्रयास करने चाहिए। हाथों से शरीर को जल्दी-जल्दी रगड़ना चाहिए।
अधिक से अधिक समय स्वच्छ वायु के संपर्क में रहने के प्रयास किए जाने चाहिए। संभव नहीं हो तो कम से कम आधा घंटा तो स्वच्छ वायु में रहना ही चाहिए। भ्रमण, व्यायाम व खेल-कूद क्रियाएं आदि की जानी चाहिए।
प्रयास करें कि अधिकतम कार्य खुली हवा व आकाश में किए जा सकें। खुले आकाश के नीचे सोना भी हितकर है। बंद कमरों के बजाए खुले में सोने का अभ्यास करना चाहिए। घर की खिड़कियां आदि खोलकर सोना चाहिए।
घर में शरीर में कपड़े लाद कर नहीं रहें बल्कि कम से कम कपड़े पहनने चाहिए। पहनने के कपड़े हल्के, छिद्रयुक्त व पतले होने चाहिए जिससे हवा का आवागमन बना रह सकें और हवा त्वचा को स्पर्श कर सकें।
प्रायः रोग होने पर स्वच्छ व निर्मल वायु का सम्पर्क शीघ्र ही स्वस्थ करता है। रोगी को खुली हवा जल्दी ही रोग से ठीक करती है किन्तु जटिल व जर्जर रोग की शारीरिक अवस्था में वायु स्नान में सावधानी भी बरतनी चाहिए। प्रारम्भ में धीरे-धीरे वायु स्नान की समयावधि बढ़ानी चाहिए।
गर्मी से परेशान रोगी के शरीर से कपड़े कम कर देना चाहिए जिससे शरीर की गर्मी रूके नहीं आसानी से बाहर जा सकें।
बैचेनी व घबराहट में खुली हवा में अधिकतम रहना चाहिए। बुखार व हैजा में संतुलित वायु सेवन किया जाना हितकर है।
दुर्बल व्यक्ति को अधिक ठंडी हवा के स्पर्श में नहीं रखना चाहिए।
शीतल वायु ग्रहण करते समय सही तरीके श्वास लेना व छोड़ना चाहिए और शरीर में उद्वीपन होना चाहिए। शरीर को ठण्ड लगे या कंपकंपी हो तो यह हानिकारक है। वायु स्नान के बाद शरीर को गर्म रखने का प्रयास करना चाहिए।
हवा बदलती रहनी चाहिए। स्वच्छ हवा में रहने से मानसिक रोग भी ठीक हो जाते हैं।
सभी प्रकार के टीबी, दमा, अस्थमा व फेफड़ों के रोगों में खुली में कुछ समय बिताना हितकर है। गरम हवा फेफड़ों को कमजोर बनाती है। अनिद्रा रोग में स्वच्छ व निर्मल हवा रामबाण औषधी है।
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