लकवा क्या है? क्यों होता है? और प्राकृतिक सरल उपचार क्या है?
लकवा क्या है?
शरीर के स्नायुओं और स्नायु केन्द्र मस्तिष्क का मुख्य रोग है। स्वयं लकवा कोई एक रोग नहीं है यह मस्तिष्क, रीढ़ एवं किसी स्नायु विशेष के रोग ग्रस्त हो जाने का एक प्रमुख लक्षण होता है।
थोड़ा सा भी काम करने के बाद या बातचीत करने में भी मस्तिष्क में थकान का अनुभव होने लगे और यह प्रक्रिया लम्बी अवधि से अनुभव हो रही हो तब समझ लेना चाहिए कि लकवा होने की संभावना प्रबल हो गई है।
लकवा क्यों होता है?
लकवा कभी अचानक नहीं आता।
लकवा आने से बहुत पहले ही मस्तिष्क व शरीर का स्नायु जाल जगह-जगह कमजोर पड़ जाता है। यह सब अचानक नहीं होता है यह प्रक्रिया अर्थात् लकवा का बीजारोपण असंयमित जीवन के परिणामस्वरूप पहले ही पड़ चुका होता है।
पाचन तंत्र में किसी भी रूप में समस्या या परेशानी दिखाई देना।
हमेशा थकावट महसूस होना। थोड़ी सी मेहनत से सांस का फूलना।
सिर दर्द निरंतर बना रहना। मस्तिष्क खाली प्रतीत होना।
त्वचा ढ़ीली-ढ़ीली व बदरंग हो जाना।
भ्रम, दूषित विचार, भय व घृणा सताती रहें।
मामूली सी कड़ी बात सहन नहीं हो पाना, बैचेनी, परेशानी, हलचल, घबराहट, उदासी, भय, अवसाद, चिड़चिड़ापन, गुस्सा, द्वेष, लोभ व ईर्ष्या आदि मानसिक विकार पनप जाना।
इन्द्रियों का वश में नहीं रहना और निराशा ही निराशा जनक बातें व्यवहारित करना।
जीवन से निराश एवं उत्साह हीन हो जाना।
स्नायु तंत्र के कमजोर होने के कारण आँख व कान आदि इन्द्रियों का स्वाभाविक कार्य प्रणाली धीमी व मंद हो जाती है।
रक्तचाप व रक्त प्रवाह में असंतुलन बन जाना।
प्राकृतिक सरल उपचार
लकवे से बचने के लिए स्नायु मण्डल, स्नायु केन्द्र तथा मेरूदण्ड में किसी भी प्रकार की विकृति नहीं आने देना चाहिए यदि आ भी जाए तो तुरंत उपचार कर लेना बेहतर है।
सबसे अच्छा उपचार यह है कि आरम्भ से प्राकृतिक, संयमित, संतुलित जीवन-शैली संयम तथा नियम से अपनाएं।
स्वास्थ्यवर्धक एवं पोषक आहार लेने की आदत डाल लें।
तनाव, क्रोध एवं उ़द्वेग आदि से बिल्कुल बचने का अभ्यास करें।
मस्तिष्क में थकान अनुभव होते ही तुरंत परिश्रम बंद करके मानसिक व शारीरिक विश्राम करना चाहिए।
प्राकृतिक भोजन व प्राकृतिक हवा का सेवन अधिकतम करें।
कम बोलें। ध्यानादि का अभ्यास करें। परिश्रम कम करें साथ ही कब्ज आदि को दूर रखने का प्रयास करें।
खुश रहें, आनन्दित रहें, मनोरंजन के साधन अपनाएं और मुस्कुराने की आदत डालें।
सिर को हमेशा ठण्डा रखने का प्रयत्न करें।
मेरूदण्ड अर्थात् रीढ़ की हड्डी पर हर रोज 10 मिनट तक ठण्डे पानी का तरारा देना चाहिए।
10 मिनट ठण्डा कटि स्नान कटि स्नान और मेहन स्नान लें।
पूरे शरीर पर 15-20 मिनट मालिश लें।
सुबह जागने के बाद बिना कुल्ला किए दो-तीन ग्लास पानी पीएं।
रात को सोते समय हल्के कपड़े या कम से कम कपड़े पहन कर सोना चाहिए। अधिक चुस्त व कसें हुए कपड़े नहीं पहनें।
उत्तेजक व नशीले पदार्थों से बचें। अधिक तैलीय, मसाला, खटाई, चाय, चीनी व अचार आदि से बचें।
सिर पर नारीयल, कद्दू या शुद्ध तिल के तेल की मालिश करें।
स्नायु जाल व मस्तिष्क को शुद्ध करने तथा शक्तिशाली बनाने के लिए ब्राम्ही, कागजी बादाम तथा देशी चीनी बराबर मात्रा में लेकर बारीक चूर्ण बना लें। चूर्ण बनाने से पहले ब्राम्ही को अच्छी तरह साफ कर लें। इस पाऊडर की एक चम्मच सुबह और शाम गाय के धारोष्ण दूध के साथ सेवन करना चाहिए। इस प्रयोग से लकवा की संभावना से बचा जा सकता है।
अणु इन्द्रियों के निर्माण के लिए दिन भर में कार्य निपटाने के बाद कायोत्सर्ग अथवा शिथिलीकरण का प्रयोग रोज करें।
आठ घंटे गहरी व मीठी नींद लें।
त्वचा को शुद्ध तथा स्वच्छ रखें।
सरल शांत रहकर परमात्मा और इसकी प्रकृति पर पूर्ण विश्वास और आस्था रखकर निरर्थक बातों को जीवन से निकालिए।
एकाध दिन उपवास करें। फल या फलों के रस पर रहें जिससे शरीर से दूषित मल बाहर निकलने में सहायता मिल सकें।
व्यायाम, प्रातः तथा सायं भ्रमण ताजी व स्वच्छ हवा में रोज करें।
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