गाँधीजी भी कुदरती उपचार के समर्थक थे। शरीर की सफाई के साथ चित्त शुद्धि के उपाय भी करते रहने से स्वास्थ्य अच्छा बना रह सकता है और रोग पनपना असम्भव हो जाता है।
गाँधीजी ने मिट्टी चिकित्सा को विधिवत् चिकित्सा के रूप में प्रकट करने का अथक प्रयास किया है। गाँधीजी ने स्वयं, परिवार के सदस्यों तथा सहयोगियों पर मिट्टी के प्रभाव के अनेक परीक्षण किए और मिट्टी की उपयोगिता को सिद्ध किया कि मिट्टी में सामान्य तथा जटिल रोगों को समाप्त करने की अद्भुत गुणीय शक्ति है।

मिट्टी वात, पित्त व कफ का संतुलन बनाने वाली है साथ ही निर्मलता प्रदान करने वाली भी है। मिट्टी का प्रयोग दुर्गन्ध दूर करने वाला, ज्वर व ताप को नियंत्रित करने वाला तथा दूषित पदार्थों का नाश करने वाला है।

गाँधीजी स्वयं कब्ज से सालों पीड़ित रहे थे और रात भर पेडू पर मिट्टी रखने के प्रयोग करके अपना कब्ज रोग दूर कर लिया था।
गाँधीजी कहा करते थे कि सिर का दर्द हो तो मिट्टी सिर पर रखने से बहुत फायदा मिलता है। उनका कहना था कि सिर दर्द के कारण बहुत से हो सकते हैं किंतु कैसा भी दर्द होने पर मिट्टी की पट्टी सिर पर रखने से तुरंत लाभ मिल जाता है।

तेज बुखार व टाईफाईड होने पर पेडू पर मिट्टी की पट्टी का प्रयोग सैकड़ों लोगों पर किया और लाभ प्राप्त हुआ।
इसी प्रकार फोड़े-फुंसी, घाव व बिच्छु आदि के दंश का प्रकोप भी मिट्टी पट्टी के प्रयोग से चमत्कारी परिणाम प्राप्त हुए।
गाँधीजी स्वयं प्राकृतिक चिकित्सा के पुजारी थे और विशेषतः मिट्टी चिकित्सा व उपचार पर हजारों शोध, परीक्षण व परिणाम प्राप्त कर देहात, गाँवों व कस्बों के लोगों को सरलता से लाभान्वित किया था।
गाँधीजी ने प्राकृतिक चिकित्सा से प्रेरित होकर अनेक दिशावर्धक व लाभदायक पुस्तकें लिखी।
गाँधीजी भी कुदरती उपचार के लिए प्रेरणा व संदेश देते थे, गाँधीजी का निष्कर्ष था कि प्राकृतिक चिकित्सा स्वयं में एक विज्ञान है और एक सस्ती, सर्वसुलभ तथा निरापद चिकित्सा है जोकि हर स्तर के आम जनता की पहुँच के भीतर है और मितव्ययी भी है।
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