शिशु की सुरक्षा के लिए माता-पिता को उचित सलाह

शिशु की सुरक्षा शिशु का अवलोकन शिशु का व्यवहार स्तनपान प्रतिरक्षण उचित देखभाल संक्रमण की रोकथाम, पोस्टनेटल विजिट शिशु संबंधी सभी सूचनाएं नोट एवं रिकार्ड कर रखनी चाहिए।
शिशु को पहनाए जाने वाले कपड़े वातावरण के अनुकूल होने चाहिए।
नेपकिन उचित प्रकार से बांधनी चाहिए ताकि पैर आसानी से गति कर सकें।
संक्रमल व्यक्तियों से बचाना चाहिए।
पहचान सभी रिकार्ड पूर्ण रखने चाहिए।
जन्म के समय पैर की छाप लेकर माता पिता के नाम सहित आईडेन्टिपिफकेशन डाटा तैयार करवाना चाहिए।
जन्म के समय शिशु में दृष्टि उपस्थित होती है यद्यपि यह अपरिपक्व होती है।
शिशु चमकीले प्रकाश व काली सतह के प्रति अधिक संवेदनशील होते है।
शिशु की आँखें लगभग 15-20 सेमी दूरी पर स्थित वस्तु को अच्छी तरह देख सकती है।
मानव चेहरे की आकृतिको भी पहचानने का प्रयत्न करती है।
लगभग 5 दिन की आयु पर गतिशील वस्तु को स्थिर वस्तु से पृथक कर सकता है।
2 सप्ताह की आयु तक शिशु अपनी मां को पहचानने लगता है।
2 माह की आयु तक रंगों की जटिलताओं को समझने लगता है।
शिशु प्रायः स्त्री ध्वनि High Pitch voice तुलना में पुरूष ध्वनि में Low pitch voice तुलनात्मक अधिक असहज महसूस करता है परंतु ष्शीध्र ही शिशु मां की आवाज को पहचानने लगता है इससे मां एवं शिशु के मध्य गहरा संबंध स्थापित होने से सहायता मिलती है।
स्वाद में शिशु मीठा स्वाद पसंद करता है।
शिशु बिना धोए हुए स्तन की गंध को धोए हुए स्तन की तुलना अधिक प्राथमिकता प्रदान करता है।
स्पर्श का भी नवजात मनोविज्ञान में अत्यधिक महत्त्व होता है।
शिशु स्पर्श के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते है एवं त्वचा स्पर्श, नहाने एवं धीमी चोट करने पर आनंदित होते है। मां द्वारा स्पर्श करने पर शिशु आनंद एवं सुरक्षा का अनुभव करते है। इसलिए शिशु को मां के सम्पर्क में रहना चाहिए जिससे बच्चे व मां में संबंध प्रगाढ़ होते है।
Leave a Reply