अक्टूबर से फरवरी पाँच महीने स्वास्थ्य के लिए सर्वश्रेष्ठ क्यों है-स्वास्थ्य की रक्षा और रख-रखाव के लिए सर्दियों का मौसम सर्वश्रेष्ठ है।
बल, वीर्य, धातु वर्धक और वाजीकारक पदार्थों का सेवन सर्दियों के मौसम में अवश्य किया जाना चाहिए।

इन पाँच महीनों में आलस्य, लापरवाही और अनियमितता नहीं रख कर गहरी रूचि के साथ पौष्टिक, भारी और स्निग्ध खाद्य पदार्थों का सेवन जरूर करना चाहिए जिससे शेष 7 महीनें बड़े आराम से खुशहाली के साथ बीत सकें।

सर्दियों में शरीर की गर्मी ठण्ड के प्रभाव को कम करने के लिए तेज गति से शरीर ऊर्जा की क्षति करती है जिससे पाचन शक्ति अर्थात् जठराग्नि तेज हो जाती है।
ठण्डी वायु के स्पर्श से शरीर की गर्मी शरीर के भीतर ही रूक जाती है जिससे भारी और गरिष्ठ भोजन भी आसानी सर्दी के मौसम में पच जाता है।

पाचन शक्ति अच्छी हो तो पौष्टिक तत्त्व अर्थात् खाया पिया शरीर को पूरी तरह लग पाता है अन्यथा कितना भी पौष्टिक तत्त्व खाया जाएं और वह शरीर को नहीं लगे तब सब बेकार है।
वात रोग होने का मुख्य कारण सर्दियों में भूखा रहना या जब समय मिला तब ही भोजन लेना होता है।
सर्दियों में सुबह तथा सांयकालीन भोजन तो कम से कम एक निश्चित समय पर ही लेना चाहिए।

सुबह जल्दी उठना और रात्रि में समय पर सो जाना चाहिए अधिक देर रात तक कभी नहीं जागना चाहिए।
ठण्डे पानी से नहीं नहा सकते तो गुनगुने पानी से नहाना चाहिए किंतु अधिक गर्म पानी से नहाने से सर्दी के मौसम से मिलने वाले फायदों से वंचित रह सकते हैं।
यह हमारे लिए चेतावनी है कि शरीर में जठराग्नि प्रबल होने पर उसी अनुरूप भारी और पौष्टिक आहार बतौर ईंधन नहीं मिलें तो जठराग्नि शरीर में उत्पन्न होने वाले पहले धातु रस को ही जलाने लगती है और वात का प्रकोप कुपित होने लगता है।
निश्चित समय पर भोजन करेंगे तो निश्चित समय पर ही खुल कर भूख लगती है।
भूख लगने के लिए घड़ी का समय नहीं आपका पेट घंटी बजाने लगना चाहिए।
तेज शीत लहर से बचाव जरूर करें किंतु अपने शरीर को ठण्ड के प्रभाव से बिल्कुल भी वंचित नहीं रखना चाहिए।

खाना खाने के तुरंत बाद, नहाने से पहले, और सोते समय ठण्ड सहना ठीक नहीं होता है। सोते समय शरीर को अच्छी तरह ढ़क कर सोना चाहिए किन्तु मुँह ढ़ककर नहीं सोना चाहिए जिससे दूषित नहीं बल्कि ताजी हवा सांस द्वारा ली जा सकें।
अक्टूबर से फरवरी पाँच महीने सर्दियों के मौसम में वात अर्थात् वायु का शमन करने वाला आहार लेना चाहिए।
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