मंदाग्नि होने के कारण और उपचार जानिए-मंदाग्नि होने की शुरूआत कफ प्रकोप के कारण होती है जिसके कारण भूख कम हो जाती है। मंदाग्नि के कारण कब्ज, अतिसार, पेट में भारीपन, वात (गैस), पित्त (एसिडीटीेेेेेेे) बवासीर व संग्रहणी आदि रोग हो जाते हैं।

मंदाग्नि होने के कारण निम्नहोते हैं-
दो समय तो कम से कम निश्चित समय पर भोजन नहीं करना।
वक्त-बे-वक्त खाना खा लेना।
भोजन के ग्रास को जल्दी-जल्दी निगलना अर्थात् चबा-चबा कर नहीं खाना।
भोजन के बीच में और भोजन करने के बाद तुरंत खूब पानी पीना।
गरिष्ठ और देरी से पचने वाला भोजन नियमित करना।
मानसिक तनाव व चिंता का दबाव लगातार बने रहना।
देर रात जागना और समय पर नहीं सोना।
सूरज उगने के बाद भी देर तक सोए रहना।
श्रम से जी चुराना और व्यायाम, योगासन व भ्रमण आदि से दूर रहना।
मंदाग्नि रोग से दूर रहने का प्रयास करते रहना चाहिए। लम्बी अवधि तक मंदाग्नि रहने से वात व पित्त प्रकोप भी प्रकट हो जाता है जिसके कारण कफ के साथ वात और पित्त संबंधी रोग भी प्रकट होने लगते हैं।

खाया हुआ जब देर तक नहीं पचता है तब भोजन पक्वाशय और आंतों में ही रूका रहता है और जमा होकर सड़ता रहता है। भोजन के बाद जो रस व धातु का निर्माण उसके निर्माण में देरी हो जाती है जिसके कारण रस के बाद की धातुओं के पोषण का क्रम अवरूद्ध हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा व शुक्र इन सब सात द्यातुओं का विधिवत् और उचित समय के भीतर पोषण और निर्माण नहीं हो पाता है।

दूषित रस व धातु के प्रभाव से कमजोरी, आलस्य, भारीपन, अतिनिद्रा व थकान आदि होती है। दूषित रस व धातु खून को दूषित करते है जिसके परिणामस्वरूप चर्म रोग होने की संभावना हो जाती है। मांस धातु के दूषित होने पर फोड़े व फुन्सियां आदि त्वचा के रोग हो जाते हैं तथा अस्थि संधियों को दूषित करने से आमवात सन्धिवात, जोड़ों का दर्द, शुक्र धातु में विकार और क्षीणता होना आदि रोग हो जाते हैं।
मंदाग्नि रोग होने पर मंदाग्नि होने के कारण को सर्वप्रथम दूर किया जाना चाहिए ना कि दवाओं की ओर भागना चाहिए।
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