पूजा या वंदनीय स्थल पर जाने से क्या होगा-लोग कहते हैं मंदिर, गुरूद्वारा, चर्च या अन्य पूजनीय व वंदनीय स्थानों में क्या रखा है? यहाँ जाना तो बूढ़ों का काम है? फालतू लोग ही ऐसे स्थानों पर जाते हैं? किंतु मंदिर या अन्य वंदनीय व पूजनीय स्थान पर अच्छे स्वास्थ्य का अमूल्य राज छिपा होता है।

अत्यधिक काम, दबाव व तनाव के बीच जीवन-शैली के साथ मानसिक व शारीरिक स्थिति भी आज के वक्त में अस्त-व्यस्त हो रही है जिसके परिणाम स्वरूप उदासी, अवसाद व कुण्ठा आदि का प्रसार फैलता नज़र आ रहा हैं
सुख, शांति और आराम की तलाश बाहर ही करते हैं किंतु बार-बार बाहर झांकने से कुछ हासिल नहीं होता। शांति और आराम की तलाश करनी है तो भीतर झांकिएं। हर रोज सोते है, हर रोज उठते है, हर रोज खाते है। हर रोज दैनिक क्रियाएं करते हैं।
हर रोज अच्छे स्वास्थ्य व सुख शांति के लिए इधर-उधर भागते-दौड़ते है और चिंतित रहते है किंतु हर रोज कुछ ही मिनट के लिए ही सही अपने भीतर एकांत में झांकने के लिए वक्त नहीं निकालते।

खुद को मशीनीकरण से बचाने का प्रयास खुद को ही करना होगा और परिवार के साथ कुछ पल सुकुन और राहत के लिए खुद को ही निकालने हांेगे। शांति और आराम की तलाश खुद के अंदर करें।
काम ही पूजा है। जब तक जीवन है तब तक कर्म और पुरूषार्थ है किंतु आज अतिरिक्त काम के बोझ से अनेक शारीरिक और मानसिक तनाव, वेदना व समस्याएं झेलनी पड़ रही है जिसके कई दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं।
विकास की दौड़ में सुख चैन और स्वास्थ्य दोनों दांव पर लगा बैठते हैं। भागमभाग भरी जिंदगी में बस सफलता का एक टारगेट दिखता है किंतु इस सफलता के लिए अच्छा स्वास्थ्य भी जरूरी है, यह टारगेट भूल जाते हैं।
जीवन के लिए मोबाईल, लेपटाप, कम्प्यूटर, टीवी, कार्यशाला, बैठकें व जीवन यापन के लिए अन्य गतिविधियां जितनी जरूरी है उससे कहीं ज्यादा जरूरी सही तरीके से जीना आना है। ऊँची महत्त्वकांक्षाओं के बीच साधारण जीवन, सोच और विवेक खोने सा लगा है।
घर-बाहर से दूर मंदिर या अन्य वंदनीय और पूजनीय स्थल में शोर-शराबा व नकारात्मकता का प्रभाव दूर-दूर तक नहीं होता है और ऐसे स्थल के आस-पास की परिधि में प्रवेश करते ही मस्तिष्क में असीम शांति का अनुभव होने लगता है क्योंकि सारे लक्ष्य, नकारात्मकता और विचारों की उथल-पुथल बाहर छूट जाती है। चित्त का लक्ष्य केवल श्रद्धा और दर्शन के एक बिंदु पर आकर रूक जाता है।

अति विचारों का तूफान रूक जाना ही शांति है। मूर्ति, मंत्र, इष्टदेव या गुरू चरणों पर बंद आंखों से मन को केन्द्रित अर्थात् ध्यान करते ही कुछ ही क्षण में मन एकाग्र हो जाता है। शरीर की हर एक कोशिका को विश्राम मिल जाता है और तब ऊर्जा का सकारात्मक प्रवाहन होने लगता है जिससे दृढ़ता व स्थिरता का उद्गम भीतर होने लगता है और स्वतः ही भीतर झांकने की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है।
पूजा या वंदनीय स्थल पर जाने से सकारात्मकता का प्रवाहन इतना जबरदस्त होता है कि व्यक्ति फिर किसी भी प्रकार का बाहरी या आंतरिक दबाव व तनाव आसानी से झेलने व उबरने की क्षमता पा लेता है।
वेद, पुराणों, गुरू आश्रमों व परिवारों में बचपन से ही बच्चों को मंदिर, गुरूद्वारा, चर्च या अन्य श्रद्धेय स्थलों पर नियमित जाने, मंत्र पढ़ने व वंदन करने जैसे गुण सिखाएं जाते रहे हैं।

ईश्वर व गुरू भक्ति के पीछे तरंगित होती सकारात्मकता में भी अच्छे स्वास्थ्य के भलें राज छिपे है किंतु यह स्थिति आज लुप्तप्राय सी हो रही है और अधिक से अधिक शारीरिक और मानसिक बीमारियां परोस रही है। ध्यान के अभ्यास से कुछ ही घंटों में गहरी नींद ली जा सकती है और शरीर के तंतुओं को नई ऊर्जा मिल पाती है जोकि अच्छी सेहत के लिए बहुत जरूरी है।
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